Friday, November 2, 2012

हर शख्स में कुछ बात होती है, हर रिश्ता कुछ खास होता है

वो मेरी परवाह करता था, नहीं कोई रिश्ता तो न था उससे पर फिर भी....मुझे अब भी याद है मैं जब पहली बार दिल्ली आई थी, वो रोया था, और रोते रोते उसने कहा था, ‘आप जा रही हैं मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा, और मैं मर्द का रोना गुनाह समझता हूँ, फिर भी देखिये जाने कैसे मेरी आँखों से आंसूं निकल गए आज, आपकी बहुत याद आएगी!’ हाँ तुम्हारा नाम बिलकुल उसी का नाम है....उम्र भी शायद कुछ कुछ उतनी ही, नहीं ..वो मुझसे छोटा था पूरे एक महीने, और मैं उसे इस एक महीने के अंतर कि दुहाई देती, बात बात पे कहती ‘तुम मुझसे छोटे हो’ बिलकुल मेरे छोटे...........’ और बस वो मुझे रोक देता, कहता किसी रिश्ते का नाम न दें....मेरी भावना जो आपके लिए है और आपकी भावना जो मेरे लिए है उसे बस..रहने दीजिये! वो नासमझ था, मासूम था, अब भी याद है, उसकी दीदी थी, जो मेरी दोस्त थी, वो मुझसे बड़ी थी, पर मुझे उसके साथ वक़्त गुज़ारना पसंद था, जब मैं उसकी ज़िन्दगी में आई तो वो अपने भाई को ज्यादा वक़्त न दे पाती, इस वजह से पहले पहल मेरी और उसकी बिलकुल बात चित न होती, वो मुझे पसंद न करता था, वो कमरे में आता तो बस अपने काम के लिए, और फिर जल्द ही चला जाता, मुझे बस इतना मालूम होता के वो शर्मीला है, पर अच्छा लगता.....एक दिन मैं जब उसके घर गयी तो उसकी दीदी नहीं थी, और वो मेरे लिए चाय बना कर लाया, मैंने कहा ‘यहीं बैठकर पी लो, मैं काटती नहीं हूँ, और वो हंस पड़ा, उसकी हंसी निश्छल थी, बिलकुल एक मासूम बच्चे कि तरह...और हम दोस्त बन गए, हर शाम, मैं और वो छत पर टहला करते, और वो अपनी बातों से हंसाता रहता,  उसने कहा था एक बार, मुझे आपको हँसता देखना बहोत अच्छा लगता है, हर शाम वो दो टॉफियां खरीदता और एक मुझे देता, वो उम्र न थी ऐसी के ज्यादा सोचूं, बस हँसना खेलना अच्छा लगता......मुझे एक महीने बाद ही दिल्ली शिफ्ट होना पड़ा, और वो वहीँ रह गया, और अगले कई महीने मैं वापस नहीं गयी, करीब चार महीने बाद जब गयी तो वो मिलने आया था, हर रोज़ दो टॉफियां खरीदता, एक खुद खाता और एक मेरे लिए रखता! साड़ी टॉफियां दी उसने मुझे एक साथ, उसने कुछ कहा नहीं...लेकिन मुमकिन न था उसके लिए कुछ भी छिपा पाना!

No comments:

Post a Comment