Monday, December 3, 2012

एक परीक्षा अपनी भी

आज तुम परेशान हो, जब से मैंने तुमसे ये कहा के मैं अब और दिखावा नहीं कर सकती के मुझको अब कुछ भी महसूस नहीं होता है............तुम्हारे होते हुए भी रहती हूँ तनहा अकेली और जब तुम होते नहीं तो वो जुदाई का वक़्त रह रह कर याद आता है, मैंने ये भी कहा था के अब मुझको कुछ भी महसूस होता नहीं के मुझे तुम छूते हो तो वो पहले से हरहराहत नहीं होती है, और जो चले जाते हो तो इंतज़ार नहीं रहता अब, तुम जब कहते हो के तुम्हे प्यार है मुझसे अब भी पर ग़म है दुनिया के, तुम्हारा प्यार नज़र आता नहीं बस वो एक शख्स नज़र आता है के जिसके काँधे पर, लदी हैं बोझ जिम्मेदारियों की जो प्यार तो कर सकता है पर स्वीकार नहीं कर सकता...

मुझमें दर्द भरा है और कुछ भी नहीं, कुछ भी बचा नहीं के दे दूँ और कह दूं के ले लो वही एहसास फिर से ले लो मेरा समर्पण और देखो वही फिक्र मेरी आँखों में, ये सब नहीं कह सकती...

रात ठंडी हवा बह रही थी और मै देर रात खड़ी रही अपने बालकनी में, मेरे चेहरे को ठंडी हवा कुछ इस तरह से छूती रही के जैसे बर्फ की बारिश हो किसी ठण्ड तनहा सी रात में, मैं देखना चाहती थी के क्या एक बार फिर से उसी तरह मैं देर रात तुम्हारा इंतज़ार करूँ तो लौट आएगा वो पहले सा प्यार? क्या मेरा दिल धड्केगा तुम्हारी हलकी सी आवाज़ से भी, क्या फिर इस दिल में वही पहली सी तरंगे बजेंगी क्या एक बार फिर मैं तुमसे बोलूंगी पूरे एहसास के साथ के ‘मैं तुम्हारे बिन नहीं जी सकती, तुम कभी मुझे छोड़ोगे तो नहीं?’ ऐसी अनगिनत सोच लिए देर रात मैं ठंडी हवाओं से जूझती रही...............

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