Monday, December 10, 2012

बस यूँ ही...

बदला कुछ हमदोनो के बीच नहीं,
जो बदला, वो मेरे अन्दर बदला है,
तुम्हारा मुझे छोड़कर जाने का रंग इतना गाढ़ा है,
के तुम लौट आए हो, इसपर यकीन अब होता नहीं


काश एहसास मिला करते बाज़ार में,
के जब कम होने लगते मेरे अन्दर,
तो ले आती मैं खरीद के
और दे देती तुम्हे,
सबकुछ वही पहले सा,
अपनी वही महकी सी मुस्कान,
वही हाथों की गर्मी,
वही परवाह भरी निगाहें,
तुम्हारी निगाहों के हर सवाल का एक सटीक सा जवाब होता मेरे पास,
आज कुछ भी पाती नहीं अपने अन्दर,
बची हैं तो सिर्फ चंद घिसी हुई लकीरें,
और कुछ फीकी सी हंसी.........


 

 

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