Wednesday, December 12, 2012

बारहाँ

बारहाँ तुमने मुझे ग़लत ठहराया है,
बारहाँ मेरे प्यार को ठुकराया है,
फिर भी जब जब आई है मुझे बेइन्तहाँ याद तुम्हारी,
कैसे भला मुझे तुमने एक झलक दिखाया है,
कभी यूँ तो करती नहीं कि आ जाऊं,
और करूँ मिन्नत तुम्हारी,
पकड़ लूँ हाथ और कह दूँ कि मुझे छोड़ के अब न जाना तुम,
तुम्हारे बिन एक सांस भी खुलकर आती नहीं सीने में,
ज़िन्दगी के सारे रंग बेमाने हैं बेरंग हैं,
नहीं ऐसा कभी भी हुआ नहीं,
पर फिर भी जाने क्या बात है,
कि जब हो जाती हूँ बेज़ार, रह जाती हूँ एक बुत सी, खामोश, बेहद तनहा, आँखें जब लगती हैं पथराने, और सब हो जाता है बेमाने,
कि आते हो तुम,
कि आते हो तुम एक हवा के झोंके के साथ
और छू लेते हो मुझे, भर देते हो चंद और उधार की सांसें, डाल देते हो ज़रा सी जान इस मुर्दा लड़की में,
ये क्या है, जो प्यार नहीं तो क्या है...कहो?  

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