Tuesday, December 25, 2012

शादी

कैसे कर पाते हो तुम ये सब,
कि तोड़ देते हो दिल को मेरे,
भरोसे को और उम्मीद को,
और चल देते हो हाथ डुलाते हुए,
कुछ ऐसे कि जैसे मैं तुम्हारी कुछ नहीं लगती,
कुछ भी नहीं लगती!
वो रिश्ता जो पिरोया था तुमने समाज को साक्षी मानकर,
वो फेरे कि जिनको लेते वक़्त खायी थी तुमने कसमें,
के थामे रखोगे हाथ मेरा,
ज़िन्दगी के हर मोड़ पर,
हर दर्द मुझसे पहले तुमसे होकर गुजरेगी,
फिर ऐसा मुमकिन कैसे हो पाता है तुम्हारे लिए,
कि जब भी कोई ज़ख्म राह में होता है,
करता हुआ इंतज़ार,
और फिर करता है प्रहार,
तुम कर देते हो मेरा हाथ पकड़कर आगे,
और छोड़ देते हो अकेली जूझने के लिए,
भूल जाते हो वो आँचल,
कि जिसकी छाँव में तुमने अनगिनत साल गुज़ारे हैं,
भूल जाते हो वो दुआएं,
जिनकी वजह से तुमने ऊँचाइयों को छुआ है,
भूल जाते हो इस बात को
कि एक लड़की ने अपना सबकुछ छोड़ दिया
सिर्फ तुम्हारा साथ निभाने के लिए,
क्या उसे छोड़ते हुए तुम्हे दर्द नहीं होता?
क्या कुछ भी फर्क नहीं पड़ता
कुछ भी महसूस नहीं होता तुम्हे?

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