Friday, December 28, 2012

सोचती हूँ, कभी यूँ भी तो होगा न!

सोचती हूँ,
कभी यूँ भी तो होगा न,
कि तुम लौटकर आओगे घर और दोगे आवाज़ मुझे,
जाओगे अन्दर के कमरे में, टेरिस पर, किचन में,
और फिर याद आएगा तुम्हे, कि मैं तुमसे रूठकर दूर चली गयी हूँ,
उलटे पाँव लौटोगे तुम, बेतहाशा दौड़ते हुए, ढूंढोगे मुझे,
पूछोगे हर राहगीर से,
एक मासूम सी भोली सी लड़की देखी है, वो मेरी पत्नी है?
जिसके हाथों में हैं चूड़ीयाँ और माथे पर बिंदियाँ सजा राखी है,
हाथो में मेहंदी है मेरे नाम की,
मैंने कई बार दिल तोड़ा है उसका, और सोचा हमेशा यही के रहेगी मेरे साथ हर हाल में, वो गयी भी नहीं, कहीं भी, कभी भी..पिछले कई साल में,
पर कल रात मैंने अपनी हर हदें पार कर दी,
उसकी मासूमियत को कुचल डाला, उसको अपमान के कई शब्द बोले,
वो रूठकर बैठी थी वहीँ टेरिस पर,
जहाँ उसने लगाये थे अनगिनत पौधे,
और जिनका करती थी वो देखभाल ठीक अपने बच्चे की तरह,
कहो..देखा है किसी ने उसे,
उसकी आँखें बड़ी हैं, और सुन्दर भी, पर कल रात भर वो रोती रही,
सुबह मैंने उसका चेहरा एक बार भी देखा नहीं, और चला गया था उसे छोड़कर,
मैं आश्वस्त था के वो यहीं मिलेगी, यही टेरिस पर मेरा इंतजार करती मिलेगी मुझको  पर आज वो मिली नहीं,
किसी ने देखा है उसे??

2 comments:

  1. SUPERLIKE MA'M......aap bhut sunder likhte ho aur man k dard ko lafzo m bayan karte ho.....pad kar aankhen bhar jati hai.....Regards,POOJA

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    1. शुक्रिया पूजा जी, हौसला अफज़ाइ के लिए.

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