Wednesday, December 5, 2012

बस यूँ ही

अजब इत्तेफाक है
के वो तो कुछ कहते ही नहीं,
और उनकी आँखें चुप रहती भी नहीं..
के जब भी निश्चय करती हूँ,
फिर लौट के न आउंगी,
वो अपनी नज़रों से एक खामोश, अनदेखा सा जाल फेंकते हैं,
और कर लेते हैं क़ैद मुझे..
उस दायरे में के जहां मेरी सोच पर भी रहता नहीं इख्त्यार मेरा,
कभी कभी सोचती हूँ कहीं मैं मीरा तो नहीं बन बैठी अपने कृष्ण की... 

ये चेहरे पर मुस्कान क्यूँ बिख़र जाती है, कम्बख़्त धड़कने तहज़ीब क्यूँ भूल जाती हैँ, तुम्हारी एक आहट और सारी भौगोलिक दूरी मैँ कैसे भूल जाती हूँ, कैसे भूल जाती हूँ कि तुमने मुझे अस्वीकार कर दिया।..........

मैने ख़ुद अपने हाथो बंद कर दिये वो तमाम रास्ते जो तुमसे मुझतक पहोँचते थे, फ़िर जाने क्यूँ बार बार तुम्हारी गली मेँ आती हूँ, आते जाते लोगोँ से तुम्हारी ख़ैरियत पूछती हूँ ऑर करती हूँ इंतज़ार के कोई यृँ भी कहे के तुमने मुझे याद किया, के तुम्हे ग़म है अपने जुदा होने का।...................

 

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