Monday, December 10, 2012

हाँ तुम्हारी उम्र में मैं समझदार न थी....

नहीं जानती थी कि दुनियां क्या है,
क्या है ये रस्में ये रिवाजें
कि जिनके आगे भूल जाते हैं लोग सबकुछ,
भूल जाते हैं वो कसमें जो खायी थी किसी का हाथ थामकर,
भूल जाते हैं वो तमाम वादें, जिन वादों के डोर थामे चल देता है कोई बगैर सोचे बगैर समझे,
भूल जाते हैं वो आँखें कि जिनको देखे बगैर होती न थी सुबह, ढलती न थी शाम,
उनदिनों मैं अक्सर सोचा करती थी कि मोहब्बत से ऊपर कुछ भी नहीं,
जिस शख्स को मिल जाए वो,
जिस से वो करता है बेपनाह मोहब्बत,
फिर और किसी भी चीज़ की होती नहीं दरकार,
मुहब्बत एक खुमारी है के जब चढ़ जाए तो कुछ और नज़र आता ही नहीं,
बस वो एक शख्स नज़र आता है, के जिसको मान बैठते हैं हम अपनी किस्मत,
उस एक शख्स का साथ पाने के लिए हम सबकुछ भूल बैठते हैं,
भूल बैठते हैं के सच ये नहीं.....कुछ और है,
सच है.....मजबूरी, लाचारी, रस्म, समाज,
और इनका असर होता है हमपर कुछ इस तरह के हम रह जाते हैं सदा के लिए
तनहा, अकेले, बंजारों सा ये मन हो जाता है,
इस बंजारे मन में रह जाती है चंद यादें, नाकाम हौसले, डर, घबराहट, दर्द, बेचैनी, परेशानी और एक वक़्त के बाद वो भी नहीं रहता, जब हो जाता है सबकुछ जल कर ख़ाक, तो कहलाते हैं हम समझदार...............
हाँ तुम्हारी उम्र में मैं समझदार न थी..............

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