Wednesday, December 5, 2012

कितने छल और?

चलते चलते सांस जैसे रुकने लगती है, जैसे किसी ने एक जंजीर लगाकर जोर से अपनी ओर खीचा हो, एक पल में दिल सारी हकीक़त भूलकर भागने लगता है तुम्हारी परछाई के पीछे, और तुम भागते जाते हो किसी अँधेरे जंगल में, इस भाग दौड़ में हार अक्सर मेरे दिल की होती है, जो लौट आता है नाकाम सा हाथ डुलाते हुए, सर झुकाए हुए, जब दूर से दिखता है, नाकामी उसकी शक्ल में होती है, जिसे देख पाती हूँ सीर्फ मैं, फिर से भर लेती हूँ अपने सीने के अन्दर और करती हूँ कोशिश के बाँध दूं उसे सच्चाई के धागे से, और कह दूँ के ऐ दिल अब बस कर, मत सोच और उसके बारे में, के हर बार की तेरी नाकामी मुझे कर देती है और भी कमज़ोर, तू जब जब जाता है मुझको छोड़ कर उसके पीछे मैं हार सी जाती हूँ, और डर जाती हूँ पल पल, के इस बार तू लौटेगा के नहीं, वो कहता कुछ नहीं बस बैठ जाता है अपनी आँखें मूंदकर फिर से तुम्हारी उस एक झलक के इंतज़ार में...

7 comments:

  1. एक निवेदन
    कृपया निम्नानुसार कमेंट बॉक्स मे से वर्ड वैरिफिकेशन को हटा लें।
    इससे आपके पाठकों को कमेन्ट देते समय असुविधा नहीं होगी।
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    अधिक जानकारी के लिए कृपया निम्न वीडियो देखें-
    http://www.youtube.com/watch?v=L0nCfXRY5dk

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  2. जी शुक्रिया...
    ज़रूर वर्ड वैरिफिकेशन को जल्द ही हटा लुंगी. शुक्रिया

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  3. कल 08/12/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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    1. यशवंत जी...इतनी अहमियत देने के लिए शुक्रिया

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  4. Replies
    1. सराहने के लिए शुक्रिया निवेदिता जी..

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