Friday, December 7, 2012

बस यूँ ही....

जानती हूँ के तुम समझाने की कोशिश कर रहे थे,
वक़्त, दुनिया, समाज, और समझ की बातें कर रहे थे,
पर प्यार में समझाने से कब कौन समझा है?
अब दर्द मिला है, खुद ही समझ जाउंगी...

दिल फरेब निगाहों से उसकी बचने की हर मुमकिन कोशिश तो की मगर
उसने नज़रों के जाल से हर बार मात दी

जब तुम मिले न थे ज़िन्दगी मुक़म्मल ही थी,
बिछड़ के तुमसे ज़िन्दगी नातमाम हो गयी...
 

बेतहाशा दौड़ते रहे कई सदियों तक,
एक तेरा दामन थामने के वास्ते,
न तू मिला न रहगुज़र न दामन ही तेरा,
आज लौटे तो साथ बची तन्हाई...
 

सांवरे से नैन मिले, नैन हुए बावरे,
कोई कहे कित छुपाऊं, नैन मोरे बाँवरे..

 बार एक दर्द हुआ, तुझे याद मैंने जब जब किया,
तेरी याद के साए में मेरी रुसवाइयों के लम्हे थे..
 

वो जो मुझको मेरी हदों में रहने की सलाह देता रहा,
आज खुद पे आई तो सारी सरहदें भूल गया..
 

कभी कभी सोचती हूँ के भ्रम में जीना बेहतर है, या 'सच' में?
भ्रम मुस्कुराने की वजह देता है, और 'सच'...कडवी मिर्च आँखों में डालता है,
भ्रम कुछ वक़्त के लिए ही सही हमें हमारी अहमियत बताता है, और 'सच'...हमेशा धरातल पर पटकता है.........

पर एक 'सच' ये भी है के भ्रम की उम्र चाहे कितनी भी लम्बी हो, वो ख़त्म हो जाती है एक दिन, और तब सच और भी कड़वा लगता है.............
 

दिल तड़पता रहा उसके जाने के बाद,
मौत आई न मुझे जिस्म के मर जाने के बाद.
 

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