Wednesday, January 2, 2013

मेरा प्रेम अब तुम तक सिमित नहीं

अब छट गयी है बदली,
सब साफ़ नज़र आ रहा है,
तुम दूर हो, इसलिए कि तुम्हे दूर होना ही था,
यही नियति थी,
हमारा प्रेम जन्मा था, पनपा था,
इसी तरह विलीन होने के लिए,
प्रेम को शब्दों में समेटने की कोशिश की मैंने,
प्रेम जानने की समझने की कोशिश की मैंने,
प्रेम को पाना चाहा, प्रेम को देना चाहा,
प्रेम में खुद को डुबोने की कोशिश की मैंने,
तुम्हारे प्रेम ने मुझमें अथाह प्रेम का प्रवाह कर दिया,
की अब मुझसे होकर गुजरने वाली हर कली से मुझे प्रेम है,
हर बच्चे से, हर नदी, हर पहाड़ से मुझे प्रेम है,
मेरा प्रेम अब तुम तक सिमित नहीं,
अब ये मुझमें हैं, और मुझसे ही प्रवाहित होगा सबमें..

4 comments:

  1. बहुत सुन्दर.....
    मेरा प्रेम अब तुम तक सिमित नहीं,
    अब ये मुझमें हैं, और मुझसे ही प्रवाहित होगा सबमें..
    वाह...

    अनु

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  2. बहुत ही बढ़िया


    सादर

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    1. शुक्रिया यशवंत जी

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