Friday, January 11, 2013

‘प्यार’

उसने अपनी पोटली में अनगिनत बहाने छिपा रखे थे, जब भी जरा सा जी उकताता उसका रोज़मर्रा की बातों से, एक बहाना निकाल...खुल के मुस्कुरा लेती ..मैंने उसके चेहरे पर उदासी कभी देखी नहीं

कि जबसे उसने किनारा कर लिया, उस हर ‘अपने’ से जो अपना होने का दंभ भरते थे, उसकी शादी के दिन भी वो रोई नहीं, उसको कोई ग़म न था माँ बाप से बिछड़ने का, उसने अपने पति का देखभाल और अपनी बेटी का पालन पोषण किया पर उम्मीद नहीं की, कहती थी, ‘मुझे किसी से कोई उम्मीद नहीं, मैंने सिर्फ फ़र्ज़ निभाना जाना है, उम्मीदें दिल को बस तोड़ना  जानती हैं, उम्मीदें बेआबरू, बेआसरा कर छोडती हैं’,
रश्मि शादी के पहले किसी से प्यार करती थी, बेपनाह प्यार, कहती थी, ‘कोई ज़रूरी नहीं कि आप जिससे प्यार करते हैं उस से मिलते जुलते रहे, वो दूर है तो क्या हुआ मेरे दिल में उसके लिए बेपनाह प्यार है’, राहुल के नाम से भी शर्मा जाया करती थी, वो उसे अपने तब मिला था जब वो अपने रिश्तेदार की शादी में आया हुआ था, वो एक शांत, पर तीखी नज़र का लड़का था, जितना ही सभ्य और शालीन था, उतना ही समझदार और खूबसूरत भी, सांवला सा चेहरा, छह फिट की हाइट, बड़ी बड़ी आँखें, ऐसी शक्सियत से भला कौन न प्रभावित होता, उस शादी में हर लड़की के लब पर बस एक ही नाम था ‘राहुल’, पर राहुल की नज़रें उस लड़की पर जा टिकी जो उन सब में सबसे अलग थी, दिखने में कुछ ख़ास न थी, पर जब हंसती तो उसे देखनेवालों के चेहरे पर भी मुस्कान बिखर जाती, राहुल पर भी उसका असर हुआ, राहुल ने जाते जाते, उसके हाथ में एक चिट्ठी थमा थी, और उस रोज़ के बाद से कुल जमा तीन काम थे उसके पास, सुबह उठकर राहुल की तस्वीर देखना, दिन भर डायरी में राहुल के साथ गुज़रे उन ‘दो दिनों’ को सौ बार लिखना, और रात होते ही राहुल की तस्वीर आँखों में सजाए सो जाना, न घरवालों की परवाह थी, न अपने भविष्य की फिक्र, पर किसी ने कहा है न कि ख्वाबों की  दुनिया में जीने वाले अक्सर हकीक़त की ज़मीन पर औंधे मुह गिरते हैं....माँ बाप के सामने जिस दिन अपने एहसास ज़ाहिर किये, माँ बाप ने साफ़ इनकार कर दिया, घर छोड़ वो उस शहर में आ गयी जहाँ राहुल था लेकिन................वो राहुल, जिसके साथ उसने सुनहरे भविष्य के सपने देखे थे, एक शांत, समझदार, मासूम सा लड़का जिसकी तस्वीर रश्मि की आँखों में रहा करती थी, जब पूरे पांच साल बाद रश्मि..राहुल से मिली तो वो...वो न था, वो कुछ और ही था, इन्फेक्ट रश्मि को तो पहली झलक में वो ठीक से पहचान भी न सका, उसने राहुल को बार बार याद दिलाया, गुहार लगाई, मिन्नतें की, कि वो उसे इस तरह न ठुकराए, प्यार में कहाँ याद रहता है किसी को सेल्फ रेस्पेक्ट, रश्मि भी सबकुछ भूल चुकी थी बस एक अंतिम आस थी के शायद...........................! लेकिन आखिर वही हुआ जो अक्सर इस तरह की कहानी के अंत में होता है, प्यार में धोका मिला, दिल टूट गया, और फिर माँ बाप के जिद्द पर घुटने टेक दिए रश्मि ने.............

हाँ, कहानी थोड़ी फिल्मी है पर रियल है, उस लड़की को मैं जानती हूँ, वो जब भी मिलती है मुझसे, खुलकर हंसती है, मुस्कुराती है, कोई शिकन नहीं देखा उसके चेहरे पर, पर वो चंचलता, वो अल्ल्हड़पन अब उसमें शेष नहीं, उसकी हंसी में जैसे एक ब्रेक सा लग जाता है, यदि कोई उस लफ्ज़ का ज़िक्र भी कर दे जिसे कहते हैं ‘प्यार’

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