Wednesday, January 16, 2013

एक तेरी याद ही मुक़म्मल है।

बेतहाशा दौड़ते दौड़ते कभी अचानक ही रुक जाएं, तो समझ आता है,
कितना सही किया और कितना ग़लत,
कितने करीब आए...और करीब आने की चाहत में कितने दूर हो गए.......

तुम्हारा साथ जैसे तारों की झिलमिलाती दुनिया,
जैसे जहान के ग़म से दूर, ख्वाबों ख्यालों की दुनिया,
जैसे माँ की कहानियों का सच हो जाना,
जैसे बाली उमर में बुने गए सपनो का सच हो जाना,
जैसे बच्चों की कल्पनाओं में जान आ जाना, दिल का धडकना,
उम्र का आखिरी पड़ाव, मृत्यु सामने और जी जाएं एक पल को सोचकर कि तुम मेरे सिरहाने बैठे हो.....


****
ये आभासी रिश्ते....पड़ जाते हैँ कमज़ोर एक दिन, ठीक उस दिन जिस दिन ख़त्म होने लगता है इनके बीच का खिचाव, पड़ जाती है ढीली पकड़, न आकर्शण बचता है न गर्मी बचती है, खो जाती है खुश्बू ऐसे, काग़ज़ के महज़ फूल होँ जैसे, सब बेमाने हैँ यहाँ, सब दिखावा है यहाँ, न दिल का जुड़ाव है, न खून का लगाव है, मात्र छल है, दिखावा है, झूठ है, बहलावा है....ये आभासी रिश्ते।

****

मैँ तो असफ़ल ही रही हमेषा की तरह, कि टूटकर नफ़रत नही होती मुझसे, टूटकर प्यार किया था जिससे।

****

ख़ामोश रात, घड़ी की टिकटिक, सर्द हवा, बोझिल पल्केँ, चंद साँसे...वो भी ठहरी हुयी.......ये सब आनी जानी है,................. एक तेरी याद ही मुक़म्मल है।

 

No comments:

Post a Comment