Wednesday, January 16, 2013

कुछ बातें

कुछ अनकही सी बातें,
कुछ अनबुझे से पल हैं,
मेरी उदासियों में,
सिमटा सा मेरा कल है..


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चंद अधूरे खाब,
चंद अधूरी ख्वाहिशें,
चंद ज़ख्मों की रवायत,
चंद उम्मीदों की आहट,
चंद साँसों की हरारत,
चंद उँगलियों का आपस में जुड़ना,
चंद पलकों का झुकके फिर उठना,
चंद यादों में जागती आँखें,
और खुद में सिमटी बाहें,
चंद तन्हाईयों से भरी शामें,
चंद दर्द से कराहती रातें..
चंद यादें.....चंद यादें...
 

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कांच चुभने लगी है आँखों में,
दिल में एक टीस सी उठी है अभी,
ग़म तेरा मुझको अब सताता है बहुत...


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हर मोड़ पर ठोकर लगी, हर राह मेँ दिल थर्राया,
हर शख्स नेँ छला मुझको, तब जा के मुझे जीना आया।

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हकीक़त की ज़मीन से ख्वाहिशों के आसमान तक,
फेरे लगाए, बहुत दूर चले आए,
तेरे आहट से जो होती थी दिल की धड़कने तेज़,
सांस भर जाती थी अक्सर फिर सीने में,
उन्ही सिमटे हुए साँसों की क़सम,
तेरे बिन आज चंद सांस को तरसते हैं हम,

औंधे मुह गिरते हुए कभी ख्वाहिशों को देखा है???


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न साल नापे हैं, न उम्र गिनी है,
तुझसे बिछड़ने के बाद, सिर्फ इंतज़ार किया है.

 

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