Saturday, January 5, 2013

वादा

उसने वादा किया था
ठीक पांच तारीख को आएगा,
सुबह सवेरे उठ के मैंने धुंद को फूँका,
चाँद ज़रा  मद्धम हो चला था, सो हौले से सरका दिया,
सूरज को हथेली में थामकर आसमान पर ले आई और टांग दिया,
गमले में कलियाँ जो शायद कल सुबह तक मुस्कुराती,
उन्हें प्यार से सहलाया और वो खिल उठी.
सुबह गुजरी अब शाम आने को है,
दूर तलक जहाँ भी नज़र ये जाती है,
न वो नज़र आता है, न उसका साया ही,
सिर्फ एक आस है जो जाती नहीं,
जो न ख़त्म होती है, न बुझती है, न छुपती ही है........

12 comments:

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    1. शुक्रिया यशवंत जी

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  2. आह....
    बेहद भावपूर्ण रचना,,,,,

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    1. शुक्रिया रीना मौर्या जी

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  3. दिनांक 07/01/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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    1. शुक्रिया निहार जी

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  5. बहुत प्यारी रचना ....

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  6. यह आशा ही तो जीने का सहारा है..बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना...

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    1. शुक्रिया कैलाश जी..

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