Monday, January 7, 2013

कल्पना या सत्य!............मेरे बाबूजी

वो हँसते तो यूँ लगता, जैसे ज़िन्दगी मुस्कुरा रही हो, जब कभी वो पढ़ाते वक़्त गुस्से से देखते तो उनकी बड़ी बड़ी आँखें और भी बड़ी हो जाती, हल्की लालिमा झाँका करती थी उनकी आँखों से, और माँ से कहते आपकी बेटी मुझसे नहीं संभलती अब, बेहद शरारती हो गयी है, पढ़ाई में मन ही नहीं लगता इसका, और माँ कहती , आप ही ने बिगाड़ा है इसे, और चढ़ाइए सर पे....माँ बाबूजी की नोकझोक और दीदी की हंसी ही मेरी ज़िन्दगी थी, मुझे हर दिन खूबसूरत लगता था, सुबह सुबह बाबूजी पेपर और अन्य किताबों से घिर जाते, सुबह कोई तीन साढ़े तीन बजे वो उठा करते थे, छोटे से शहर में मच्छरों का बोलबाला रहता, और बाबूजी के तौलिये के सधे हुए निशाने की चपेट में वो अमूमन ही जाते थे, दीदी चाय बनाती और फिर माँ बाबूजी और दीदी साथ बैठकर चाय पीते, करीब सात बजे तक में दो प्याली चाय और ढेर सारी बातें होती थी उनसब के बीच, तब कहीं जाकर मैं चादर से अपना मुह निकालती तो देखती बाबूजी मेरे सर के पास ही खड़े हैं, और घूम रहे हैं इधर से उधर, और माँ को बोल रहे हैं, पूरी हाथ से निकल गयी है ये लड़की, कहाँ तो बच्चे सुबह सवेरे उठकर पढ़ाई करते हैं, सुन रही हैं आवाज़ वो मिश्रा जी की बेटी की आवाज़ है, रोज़ सवेरे उठकर पहाड़ा याद करती है, और इन्हें देखिये नींद ही पूरी नहीं हुई इनकी अबतक'............इतनी बातें सुनकर कौन उठ जाए, मैं भी सर झुकाए उठती फिर बाबूजी के ऑफिस जाने के वक़्त तक किताब में सर गाड़े रखती, और मन ही मन उस नीतू को गालियाँ देती, कमबख्त एक साल से वो ही दो से बीस’ तक के पहाड़ों में उलझी है, और इतनी ज़ोर ज़ोर से याद करती है के मेरे घर तक उसकी आवाज़ बेरोक टोक आती है, पर ये सब तो रोज़ का ही रूटीन था, किसी भी हाल में गुस्से की वजह कोई भी हो, मेरे बाबूजी कभी नहीं होते, मैं जब भी उनके बारे में सोचती एक हल्की सी मुस्कान चेहरे पर दौड़ जाती.........मुझे अब भी याद है जब मैं एक बार बेहद बीमार पड़ी थी, और रात के कोई दस बजे मैंने संतरे खाने की जिद्द की थी, उस ठिठुरती ठण्ड में किस तरह वो गए थे इतनी दूर पैदल चलकर, हाँ उनके स्कूटर में पेट्रोल नहीं था, पर संतरे उनकी लाडली बेटी को चाहिए थे, तो लाते कैसे नहीं भला! जाने कितनी बार यूँ भी हुआ कि मैं शाम ढलते ही सो गयी, और रात को खाने पर जब माँ ने उठाया तब जागी नहीं, यूँ तो बाबूजी के सोने का वक़्त निश्चित था, पर जब भी मैं बगैर खाना खाए सो जाती, वो रसोईघर में माँ के पास खड़े होकर मेरे लिए पराठे बनवाते, वो जानते थे के पराठे के नाम पर मैं उठ जाउंगी........अक्सर रात को सोते वक़्त जब वो अपने बिस्तर पर चले जाते तो मुझे आवाज़ देते और कहते ज़रा आओ यहाँ मेरे पैर दबा दो, अमूमन ये तब होता जब वो देखते कि मैं बड़ों की बातों में इंटरेस्ट ले रही हूँ, मेरा मूह उतर जाता, और मैं चुपचाप उनके बिस्तर पर बैठ उनका पैर दबाने लगती, जिसमें उनका पैर कम दबता और मैं हिलती ज्यादा थी, बीच बीच में डांट भी पड़ती थी, फिर जाने कब वहीँ सो जाती, और फिर माँ मुझे गोद में लेकर मेरे कमरे में पंहुचा देती, मुझे अब भी याद है जब मुझे मैट्रिक  की परीक्षा में अच्छे मार्क्स आए थे, तो वो किस कदर खुश थे, हर मिलने जुलनेवाले को गर्व से बताते रहे, कि मेरी बेटी को मुझसे भी बेहतर मार्क्स आया है........

उनके चेहरे पर मुस्कान बनी रहती थी, पान खाया करते थे वो शौख से, पर जिस दिन डॉक्टर ने कहा ‘आपको पान छोड़ना होगा, उन्हें एक मिनट भी नहीं लगा, कि पान का डब्बा उठाकर फेक दिया, वो जितने ही खुशमिजाज़ थे, उतने ही जिंदादिल, जितने ही स्वाभिमानी उतने ही परमार्थी.........वो बहुत ख़ास थे, वो अब भी बहुत ख़ास हैं, वो दीखते नहीं पर अब भी हैं मेरे दिल के सबसे महफूज़ कोने में .................

2 comments:

  1. माता-पिता होते ही ऐसे हैं। हर स्थिति में अपने बच्चों पर जान छिड़कने वाले।
    आदरणीय अंकल जी को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि।

    सादर

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  2. सही कहा आपने यशवंत जी......शुक्रिया

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