Monday, January 7, 2013

दिलासा

वो भाग जाना चाहती है, खुद को छिपा लेना चाहती है..
किसी भीड़ का हिस्सा बन जाना चाहती है,
एक ऐसी जगह जहां इतना शोर हो कि वो खुद को भी सुन न सके,
ऐसी जगह जहां कोई उसके अतीत को जनता न हो,
जहां कोई उसे सुनहरे भविष्य का सपना दिखाने वाला न हो,
जहाँ कोई ये न कहे कि ‘तुम अच्छी हो, और अच्छे लोगों के साथ अक्सर अच्छा ही होता है’,
जहां कोई ‘अपना’ होने का दंभ न भरे,
वो भूल जाना चाहती है सबको, और खुद को........

या फिर

वो एक बार फिर से वही मासूम सी बच्ची बन जाना चाहती है,
कि जब माँ कहा करती थी, एक दिन राजकुमार आएगा, घोड़े पर चढ़ के,
मेरी गुड़िया एक दिन उस राजकुमार के साथ चली जाएगी, पर हम रोएंगे नहीं
क्यूंकि वो राजकुमार हमारी गुड़िया को हमसे भी ज्यादा प्यार करेगा
उसकी आँखों में आंसू का एक कतरा भी न होगा,

वो कुछ भी चाहे पर आज में....अब और जीना नहीं चाहती,
कि आज का चेहरा घिनौना है,
खोखली सूरत लिए फिरते हैं लोग,
हर चेहरा दोहरी तस्वीर का नमूना है.....

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