Saturday, February 2, 2013

बस यूँ ही........

क्या मेरे 'होने' का आभास नहीं उसको?
क्या मेरे जाने का कोई ग़म नहीं उसको?
क्या उसकी ग़ज़लों के अशआर मेरे लिए नहीं?
क्या मेरे दिल के छाले उसके दिए नहीं?
क्या मेरे आंगन के फूलों में जो महक सी है ... वो उसकी नहीं?
क्या मेरी आँखों में जो गुंथे हुए से ख्वाब है...वो भी उसके नहीं??
 

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हर दफ़े तुमको थोड़ा और जाना है मैँने, हर दफ़े तुम थोड़े और क़रीब आये हो मेरे दिल के, हर दफ़े इश्क़ थोड़ा और बढ़ गया है तुमसे। पहले तुमसे आकर्शित हुयी फ़िर तुम्हारी आदत हुयी फ़िर तुम्हारा सम्मान किया, आख़िर तुमसे प्यार हुआ।

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खामोशियों का एक दौड़ सा चला हो जैसे
मैंने फिर से तुझे याद किया हो जैसे,
शाख टूटे न सही दिल तो मेरा टूटा है,
अपने रिश्ते में कोई सलवट सी पड़ी हो जैसे,
मेरी तकदीर के लिक्खे को मिटा कर देखो,
धुंधली ही सही, तेरी तस्वीर बनी हो जैसे।
 

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न उम्मीद करूँ तुमसे...यही बेहतर है, कि तुमसे कीये हुये हर उम्मीद का किया है मैने भुगतान क़िश्तोँ मेँ....चंद धड़कने लुटाकर, चंद साँसे गंवाकर कभी ख़ुद को भुलाकर.........

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तुमने अनगिनत उपहार दिए मुझे,
कभी प्रशंसा के रूप में, और कभी निंदा के रूप में,
पर मैंने न कभी तुम्हारी प्रशंसा को ग्रहण किया और न निंदा को,
वो तुम्हारी आँखें ही थी जो मासूम थी, निश्छल थी..
मैं तुमसे प्रेम करने पर विवश हो गयी,
वो तुम्हारा लहजा ही था..जो कोमल था, अपनत्व का एहसास था जिसमें,
मैं खुद को समर्पित करने पर विवश हो गयी,
ये तुम्हारी आँखें ही है...ये तुम्हारा लहजा ही है,
जो मुझे तुमसे दूर किये जा रहा है,
मत बदलो खुद को.....इस हद तक......

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