Thursday, February 28, 2013

यकीन

हर बार छोड़ आती हूँ खुद को,
वहीँ...नदी के उसी किनारे पर,
जहां तुमने मुझे छोड़कर जाने का फैसला किया था,
वहीँ..उसी जगह,
जहाँ मैंने खुद को तिलतिल कर मरते हुए देखा था,
जहां पाँव मेरे जम से गए थे,
जहां दिल के दर्द ने मेरी आँखों से मोती बिखेर दिए थे,
जहां दम घुटने लगा था मेरा ये सोचकर, के तुम बेवफा कैसे हो गए!
हर बार कोशिश करती हूँ
वहीँ...नदी के उसी किनारे जाकर,
के भूल जाऊं तुम्हे, या खुद को कर दूँ इस गहरे पानी के हवाले,
कि अब और इस जिस्म का बोझ मुझसे उठता नहीं,
दिल पर पत्थर रखकर, मन को हल्का करने की कोशिश करती हूँ
और छोड़ आती हूँ खुद को वहीँ उसी जगह
नदी के किनारे
जहां तुमने मुझे छोड़कर जाने का फैसला किया था,

मेरी कलाई पकड़कर रोक लेती हैं लहरें मुझे,
थाम लेता है मेरा आँचल अपनी उँगलियों में ये बादल,
और कहती है नदी की कलकल बहती पानी...
के वो महज़ मुखौटा था तुम्हारा,
अब भी पलता है दिल में प्यार तुम्हारे मेरे नाम का,
अब भी रोते हो तुम तनहा रातों को मुझे सोचकर,

6 comments:

  1. बहुत भावपूर्ण रचना..

    ReplyDelete
    Replies
    1. आभार कैलाश शर्मा जी

      Delete
  2. बेहद भावपूर्ण रचना...
    बेहतरीन.....

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत शुक्रिया रीना मौर्या जी..

      Delete