Wednesday, March 6, 2013

तुम बिन

मैंने जब से ऊँगली छुड़ा ली है कलम से,
मेरे दिन रात में सुकून का डेरा है,
न मन में बेचैनी ही बची अब,
न साँसों में तन्हाइयों का बसेरा है,
हाँ एक टीस सी उठती है कभी कभी,
कि तुझ तक अपने दिल की बात पंहुचा नहीं सकती,
आँख जो भर आती है तेरी याद में कभी कभी,
उनको तेरे दामन पर छलका नहीं सकती,

खैर कोई बात नहीं, यूँ भी एक बार कर के देखेंगे,
तूने भुला रखा है जिस तरह से हमको, हम भी तुझको भुला के देखेंगे..
दर्द से रिश्ता निभाते रहे बरसों,
जीने की आरजू में तिलतिल के मरते रहे बरसों,
अब मरने की तमन्ना में हम एक बार जी के देखंगे,
तूने भुला रखा है जिस तरह से हमको, हम भी तुझको भुला के देखेंगे..

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