Thursday, March 7, 2013

फुर्सत नहीं

नहीं..ऐसी कोई मसरूफियत नहीं,
बस फुर्सत नहीं रहती कि कुछ सोच सकूँ,
गुमसुम सी आँखें टिकी रहती हैं छत पे,
जागती आँखों में भी कोई ख्वाब पलते नहीं,
मुझे दिन भर कोई काम नहीं, पर जाने क्यूँ आराम नहीं,
गुज़रे पलों के साए में कब सुबह होती है, कब शाम...मालूम नहीं!
हाँ कभी कभी एक पल चुरा लेती हूँ, खुद से ही,
और सोचती हूँ कि सोचूं कुछ तुम्हारे बारे में, कुछ मेरे बारे में,
पर जाने क्यूँ अब भी ‘मैं-तुम’ नहीं होता मुझसे,
हम दोनों अब भी ‘हम’ ही हैं,
जब भी जरा सा अपने बारे में सोचने बैठती हूँ,
तुम्हारा मुस्कुराता चेहरा भर जाता है मेरी आँखों में,
कहो तो जरा? तुम मुझसे जुदा हो सके क्या?
आज भी अपने बदन में तुम्हारी खुशबू पाती हूँ,
आज भी देर रात बालकनी में खड़े खुद अपनी राह तकती हूँ,
आज भी मुस्कान बिखर जाती है होठों पर जब कोई लेता है नाम तुम्हारा,
आज भी हर सांस के साथ सीने में भर जाते हो तुम
और चल पड़ती है ज़िन्दगी कुछ और कदम, बेफिक्र सी,
मैं जानती हूँ मेरी आँखों में अब कोई ख्वाब नहीं,
पर क्या तुम जानते हो कि मेरी आँखों में तुम्हारी यादों के सिवा कुछ भी नहीं...
हाँ मुझे फुर्सत नहीं कि कुछ सोच सकूँ,
कि एक तुमने काबू कर रखा है मेरी हर सोच पर, मेरी हर याद पर, मेरी हर सांस पर............

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