Friday, April 12, 2013

अंतिम यात्रा


मैं जानती थी,
वो नाव डूबनेवाली थी,
नाव में पानी भरने लगा था,
दूर तक अँधेरा था,
आगे गहरा समंदर,
फिर भी मुझे आना ही था,
नाविक का हाथ थामकर,
बहती धारा के साथ मुझे बहना ही था,
उस नाव के नाविक तुम जो थे...

सुना है ज़िन्दगी कभी मौत के बाद भी मिला करती है!

8 comments:

  1. बहुत ही बढ़िया


    सादर

    ReplyDelete
  2. नाविक का हाथ थामकर,
    बहती धारा के साथ मुझे बहना ही था,
    उस नाव के नाविक तुम जो थे...
    आदरणीया चांदनी जी बहुत सुन्दर भाव ..ऐसा होना भी चाहिए नाविक का साथ दे तो नौका पार ..हौसले बुलंद ...जिन्दगी की कशमकश ....अच्छी रचना
    भ्रमर ५

    ReplyDelete
    Replies
    1. शुक्रिया सुरेन्द्र जी...

      Delete