Monday, May 6, 2013

तुम्हारे पास मौक़ा था....


तुम्हारे पास मौक़ा था,
तबतक..जबतक,
मेरे दिल की धडकनें तुम्हारी आवाज़ सुनकर बेकाबू हो जाया करती थी,
तुम्हारा ज़िक्र कोई हो, तो बेचैनी और भी बढ़ जाया करती थी,
लोगों की भीड़ में भी तन्हाई महसूस करती थी,
और हर सुबह हर शाम तुम्हारा इंतज़ार करती थी..

तुम्हारे पास मौक़ा था, तबतक मुझे पाने का, मुझसे रूठने का, मुझे मनाने का,
तुम्हारे पास मौक़ा था, मुझे ख्वाबों में भी लाने का,
मेरी उलझी लटों को सुलझाने का,
मेरे और करीब आने का,
तुम मुझे हर जन्म में स्विक्रिय थे,
हर रूप हर रंग में स्विक्रिय थे..

पर अब नहीं....
पर अब नहीं कि अब मैं कुछ भी महसूस करती नहीं,
तन्हाई और भीड़ में भी कोई फर्क महसूस करती नहीं,
मेरे दिल की दहलीज़ बहुत पहले ही तुम लांघ चुके हो,
तुम बेवफा हो ये अब तुम भी स्वीकार चुके हो...

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