Friday, May 10, 2013

मेरी डायरी के कई पन्ने अबतक खाली हैं


“इस ठहरी हुई ज़िन्दगी से ज्यादा दिलचस्प तब थी ज़िन्दगी,
कि जब बीच भंवर में भटक रही थी कहीं,
एक वजह थी जीने की तब,
एक उम्मीद थी तुम्हे पाने की तब”

“जाने कितनी ही यादों को पिरोकर बनाया था वो रिश्ता हमने,
जाने कितनी ही गलियों में ढूँढा था एक बसेरा हमने,
जाने कितने ही तारे गवाह थे हमारे उस मासूम इश्क के,
जाने कितने ही ग़मों को छोड़ा था तब तनहा हमने,
बेहिसाब ग़म हमारी दहलीज़ तक आते थे लौट जाते थे,
तमाम शब्.... बस दस्तक वो दिया करती थी,
तुम्हारा साथ जैसे ज़िन्दगी मिली मुझको,
तुम्हारे बिन तो जैसे मौत आ गयी मुझको..
जाने कितनी ही बातें लिखी और मिटा डाली,
न तुम आये, न ज़िन्दगी न ख़ुशी न सुकून....

मेरी डायरी के कई पन्ने अबतक खाली हैं.............”

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