Friday, May 31, 2013

तन्हाई...............प्यार

मन जैसे खोखला सा हो चला था,
दर्द हर पल दिल में उमरता, फिर बुझ जाता,
आँखें सूनी, कुछ ऐसी जैसे सूखा कुआं हो कोई,
सांस जो जाती थी, सो लौटकर आती न थी,
दिल की धडकनें न बढ़ती थी, न घटती ही थी,
अन्दर ही अन्दर जैसे पत्थर सी हो गई थी मैं,
अजब थी तन्हाई, जो न जाती थी, न थमती ही थी,
सच.....अजब थी तन्हाई!
और…. तुम आ गए,
तुम्हारा आना बस पल भर का,
कर गया मुझको जिंदा,
भर गया मुझमें सांसें….

देखो आज मैं पूरी हो गयी.

2 comments:

  1. hmmm..bahut khoob likha...tanhai sach mein aisi shah hai jo bheed mein bhi gher leti hai hamko....

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  2. तन्हाई में किसी अपने का अ जाना ... हवा के झोंके से कम नहीं होता ...
    बहुत खूब ...

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