Saturday, July 20, 2013

सिर्फ मेरे ...बस एक तुम..

सुनो.........रात के करीब ग्यारह बजे हैं.....मैं तुम्हारे काँधे पर सर रखे सफ़ेद चादर पर नीले आसमान के तले लेटी हूँ, तुमने सफ़ेद कुरता पायजामा पहन रखा रखा है और मैंने सफ़ेद साडी लाल किनारे वाली पहनी है, मेरे बाल खुले हैं, मांग में तुम्हारे नाम का सिन्दूर और माथे पर बड़ी सी लाल बिंदिया है....मैं और तुम बेहद व्यस्त हैं कि हमारे पास कोई काम नहीं उस नीले आकाश को देखने के सिवाहवाएं हौले हौले हमें छूकर गुज़र रही है.....विविद भारती से ‘घर’ फिल्म के गाने ‘फिर वही रात है’ की आवाज़ आ रही है....तुम मुझपर झुकते हो, तुम्हारी आँखों में शरारत होठों पर मुस्कान है..मेरी आँखें बंद हैं और होंठ कांप रहे हैं कि अचानक ही बादलों की ओंट से चाँद मुस्कुराकर झांकता है.....हमारी नज़रें मिलती हैं एक दुसरे से और तुम मुझे कसकर भर लेते हो अपनी बाहों में.....


हाँ ये भी तुमसे जुड़े ख्वाब का एक हिस्सा है...      

1 comment:

  1. बहुत ही बढ़िया


    सादर

    ReplyDelete