Tuesday, September 10, 2013

कुछ पल ऐसे भी...

अपने हाथों में उसने एक अदृश्य लोहे के छड़ के से आकार की बेहद नुकीली चीज़ पकड़ रखी थी, मैं जब भी अपने कदम उठाती और चलना शुरू करती वो मेरे बालों में अपनी उंगलियाँ फेरता...मैं मुस्कुराती, अपनी मंजिल को और थोडा नजदीक पाती, मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहता, और जैसे ही मेरे कदम ज़मीन पर पड़ते, वो जलते हुए उस छड से मेरे पैरों को दाग देता...मैं रोने लगती, दर्द से तड़पने लगती, और वो सामने खड़ा मुस्कुराता रहता.......

हर बार मेरे दर्द को कुछ और बढ़ा देता है वो,
मुस्कुराती हूँ जब भी कुछ ऐसी सज़ा देता है वो...

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