Wednesday, September 11, 2013

तुम सब एक ही मिटटी के बने हो...



तुम सब एक ही मिटटी के बने हो,
फ़िर भी लड़ते हो, झगड़ते हो, रोते हो, बिलखते हो,
यूँ तो सबकुछ करते हो, पर सोचते नहीं....
सोचते नहीं, कि तुम सब एक ही मिटटी के बने हो,
न जाती से, न मज़हब से,
न रस्म से, न रिवाज से,
मेरी बातों का ताल्लुक है,
भारत के इस समाज से,
कोई तोड़ नहीं सकता तुमको,
कोई रोक नहीं सकता तुमको,
हर मन में राम ही बसते हैं,
और राम में रहीम का डेरा है,
सब जानते हो, पर सोचते नहीं,
कि तुम सब एक ही मिटटी के बने हो...

2 comments:

  1. wahwah ya kahne! akhir prem virah ke yaadon ke siva kuchh aur bhi is duniya me kahane ko.....RD

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    1. मैडम...हम प्रेम को मानते हैं, समझते हैं इसीलिए मानव मात्र के लिए अपने मन में प्रेम रखते हैं..इस देश की सो रही जनता को जगाने का प्रयास हम हमेशा ही करते हैं....

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