Wednesday, September 18, 2013

फासला



सफ़र पर चलते वक़्त मैंने उसकी ओर एक बार पलटकर देखा तो था, वो मेरे हर बढ़ते कदम के साथ मुझसे दूर होता गया, मैंने सोचा था मेरे क़दमों के उठने से पहले ही वो मुझे रोक लेगा, थाम लेगा मेरी कलाई, और बोलेगा ‘तुम्हारे बिन मेरे लिए एक पल भी जीना नामुमकिन है’ या फिर वो बिना कुछ कहे ही, चुप चाप मेरी आँखों में देखेगा...और उसकी आँखें बोलेंगी मत जाओ.... मैं जी नहीं पाउँगा तुम्हारे बिना’

पर ऐसा कुछ भी न हुआ...वो ज़मीन पर नज़रे टिकाए कुछ सोचता रहा शायद, या बस यूँही देखता रहा होगा...उसके मन की थाह ले पाना उस रोज़ मेरे लिए नामुमकिन सा था, पूरे दस कदम के फासले पर थे हम...दो कदम मैं उस से दूर थी और आठ कदम वो मुझसे दूर था...पर फिर भी मुझे यकीन था उसकी आँखें नम होंगी मेरे जाने से, उसकी ज़िन्दगी वीरान हो जाएगी, ठीक मेरी ज़िन्दगी की तरह... मैंने अचानक ही उसकी ओर पलटकर देखा, आज हमारी नज़रें टकराई नहीं....उसकी नज़रे नीची थी, वो दरवाज़े का लॉक लगाकर घर के अन्दर जा रहा था..

वो दूरी चंद क़दमों की या फासला था उम्र भर का,
न उसने ही रोका मुझको न मैं ही लौटकर आई...

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