Friday, September 6, 2013

बस यूँ ही..............

"वो वाकिफ था
मेरे बचकानेपन से,
मेरी गुस्ताखियों से,
मेरी नासमझी से, फिर भी...
वो शिकवा करता रहा,
मुझसे दूर-दूर रहा,
मुझसे रूठा रहा,
वो वाकिफ नहीं,
मेरे दर्द से,
मुसीबतों से,
परेशानियों से,
बुरे वक़्त से, फिर भी...
उम्मीद करता रहा,
जीतेजी मरता रहा,
मुझसे प्यार करता रहा..."


"मैंने सोचा था तुम्हारे लौट आने से सब ठीक हो जाएगा..
हवाएं अपना रुख लेंगी,
पंछी अपने घोसले को लौटेंगे,
ज़िन्दगी में सुकून लौट आएगा,
और मेरे होठों पर मुस्कुराहटें थिरकेंगी....
मगर ऐसा कुछ भी न हुआ जान,
शायद वक़्त के थपेड़ों के आगे तुम्हारा प्यार बौना पड़ गया है.. "


"अब और बर्दाश्त नहीं होता,
न दिल का दर्द,
न अकेलापन,
न बेबसी,
न आंसू,
मुझे लौटा दो भगवन मेरे,
मेरी ख़ुशी,
मेरा सुकून,
मेरी ज़िन्दगी,
मेरे अपने.."


"मैं नहीं जानती क्या सोचती हूँ,
किसे सोचती हूँ, क्यूँ सोचती हूँ, 
पर दिन रात कहीं खोयी रहती हूँ,
दिल करता है, दिल खोलकर आवाज़ लगाऊं,
रोऊँ, चिल्लाऊं, उसे बुलाऊं,
पर जाने क्या सोचकर खामोश रहती हूँ,
अब मैं खामोश रहती हूँ.."

3 comments:

  1. agar samjhne mein galti nahin kar rahi to kavita k 4 para 4 alag -2 mansik sthitiyon ko dikha rahe hain .. par likha bahut achha hai ..

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  2. भावना जी...ये चारों चार कविताएँ हैं...
    शुक्रिया सराहने के लिए

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  3. बेहतरीन अभिवयक्ति.....

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