Thursday, November 14, 2013

दिल बेदिली से पिघला जा रहा था...



कहीं दूर सुरंग से जैसे कोई आवाज़ थी आई,
दर्द से अपनी मोहब्बत याद आई,
खामोशी की चीखों से मेरा घर उजड़ा जा रहा था,
दिल बेदिली से पिघला जा रहा था,

उसकी हाथो की तपिश थी,
या आँखों के डोरे थे,
आवाजों में लिपटे शब्द थे,
या ख्वाबों में छेड़ते होंठ थे उसके,
दिल यादों में डूबा जा रहा था,
दिल बेदिली से पिघला जा रहा था,

उसी एक पल थी वो आवाज़ आई,
वो एक दस्तक और मैं सकपकाई
दर्द फिर मुझको आजमा रहा था,
मेरी तन्हाई पर मुस्कुरा रहा था
दिल बेदिली से पिघला जा रहा था...

2 comments:

  1. दर्द का एहसास ऐसे चुपके से ही आता है ...

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  2. "Ummeed nahi hai jinse koi, jinpar nahi hai aitbaar,
    Har saans unhi ka karti hai, dil thhame hue kyun intezaar!"

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