Thursday, December 19, 2013

खामोशी...........

और उन दोनों के बीच एक अजब सी खामोशी थी... खामोश ज़बान और शोर मचाते दोनों के मन.. रेडियो से गाने की आवाज़ आ रही थी...’कितनी हसरत है हमें तुमसे दिल लगाने की............’ शेखर ने ड्राइव करते हुए एक बार मिरर में देखा, आरती पहले से ही शेखर को छुप छुपकर देख रही थी, पर शेखर से नज़र मिलते ही उसने नज़रें चुरा ली, वो जानती थी शेखर उसे देख रहा है, पर फिर भी कतरा रही थी नज़रें मिलाने से, आरती और शेखर के बीच की खाम...ोशी के बीच सिर्फ एक आवाज़ थी, वो आवाज़ थी आस्था की, जो गाने के बोल साथ साथ गुनगुना रही थी...गुनगुनाते हुए आस्था ने शेखर के हाथ पर हाथ रख दिया, आरती खामोश निगाह से बहार देखती रही.......आरती ने सच स्वीकार कर लिया था, ‘शेखर..अब मेरा नहीं’ शेखर ने आरती को चुना था, पर शेखर के माता पिता की चुनाव आस्था थी...शेखर की पत्नी...खामोशी जो लगातार एक दूसरे से बातें कर रही थी वो अब खामोश थी......

2 comments:

  1. अधिकतर ऐसा ही होता है इस दुनिया में।


    सादर

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    1. चंद पलों को शब्दों में बयान करना मुश्किल होता है....कल्पना की उड़ान कहीं भी जा सकती है....

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