Monday, January 13, 2014

चीख



और एक तेज़ चीख के साथ उसने अपनी दोनों हथेलियाँ अपने चेहरे पर रख ली...किसी के पिघलने की आवाज़ अब भी आ रही थी उसके सिरहाने से, किसी के नब्ज़ अब भी डूब रहे थे उसके आँगन में,
कई बार उभरते देखा था माज़ी को उसके बिस्तर की सलवटों में, कई बार उसकी हथेली पर लगे मेहन्दी के रंग.. लाल खून से लगते थे उसको, वो घंटो अपने हाथ पानी में डुबोये रखती, पर वो रंग उसका पीछा न छोड़ते, उसने चेहरे से हाथ हटाए, वो शेखर को दोनों हाथों से थाम लेना चाहती थी, रोक लेना चाहती थी खुद को उस से बिछड़ने से, वो हर गुज़रे पलों को तारों से सजाना चाहती थी, उसने शेखर को रोकने के लिए अपने पैर ज़मीन पर उतारे, और जैसे ही दौड़ी, वो मुह के बल गिर पड़ी...

ख्वाब टूट चुका था, शेखर कहीं नहीं था, दो बूँद आंसू और ख़ामोशी ने आरती का दामन थाम लिया था....

2 comments:

  1. स्वप्न की बातें कहाँ पूरी होती हैं ... पीछे रह जाती है बस खामोशी ...

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  2. ख्वाब ज़िन्दगी का आइना होती हैं लेकिन...

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