Thursday, January 16, 2014

आज भी....



एक बहुत लम्बी सी सुबह एक बहुत लम्बी सी शाम,
तुम्हारे काँधे पर मेरी जुल्फें, मेरे होंठों पर तुम्हारा नाम...


जानती हूँ, तुम न मुझे पढ़ रहे हो, न सोच रहे हो, न देख रहे हो,
पर जाने क्यूँ अब भी यकीन है,
कि आज भी तुम्हारे उस अधूरे ख्वाब का हासिल मैं ही हूँ,
कि आज भी मेरी याद से रौशन है ज़िन्दगी तुम्हारी,
कि आज भी तुम्हारी हर सुबह में मेरा ही ज़िक्र होता है,
कि आज भी हर शाम ढलती है तुम्हारी मेरे ही नाम से,
कि आज भी तुम्हे इंतज़ार है मेरा, सिर्फ मेरा....

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