Thursday, January 2, 2014

गुज़ारिश



सुनो,
अब मैं थक गयी हूँ,
तुम्हारी तरह चलते चलते थक गयी हूँ,
जो तुम चाहो तो मुस्कुराऊं मैं,
जो तुम चाहो तो चुप हो जाऊं मैं,
मैं खुद से बहुत दूर हो गयी हूँ,
तुम्हारी तरह चलते चलते थक गयी हूँ,

मुझे ख्वाब देखने का भी अधिकार नहीं,
हंसने खिलखिलाने पर इख्त्यार नहीं,
मेरे हर वक़्त का हिसाब तुम्हे चाहिए,
तुम्हारी हर बात का जवाब तुम्हे चाहिए,
मुझसे अब और ये सब सहा जाता नहीं,
‘नारी हूँ’, ये गुनाह दिल से उतर पाता नहीं,
तुम पुरुषों की मानसिकता से परेशां हो गयी हूँ,
कि तुम्हारी तरह चलते चलते थक गयी हूँ.

बक्श दो मुझे, अब बस अकेले जीने दो,
या ला दो, दो बूँद ज़हर की, और मुझे ज़हर पीने दो,
कि तुम्हारी तरह से अब और सांस ले सकती नहीं,
मैं भी इंसा हूँ, कुछ देर और चुप रह सकती नहीं,

मुझे मेरे बचपन में एक और बार जाना है,
बेवजह हँसना, खिलखिलाना, और कभी रोना है,
तुम्हारी इस दुनिया में मेरे लिए कुछ भी बाकी नहीं,
न तुम्हारी नज़र के मैं काबिल हूँ, न मुझे बनना है...........

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