Monday, January 27, 2014

यादें



साहिल तो समंदर का अंश है, कहते हैं, नदियाँ भी समंदर में मिले तो अपना अस्तित्व खो बैठती हैं, फिर कल शाम उस समंदर के किनारे जो मेरी आँखों से तैरते हुए चंद आंसू मेरे गालों से होकर गुज़रे और साहिल पर जा गिरे, वो बूँद सुबह सवेरे ठीक वैसे ही नज़र क्यूँ आते रहे, उन्होंने अपना अस्तित्व नहीं खोया, बस मुझे याद दिलाते रहे, रहरह कर मुह चिढ़ाते रहे, और कहते रहे कि खुशियों से तेरा सामना अब न होगा, चंद्यादों का सफ़र कभी ख़त्म न होगा, याद जो टीस बनकर उठती रही, याद जो बारहां दास्ताँ सुनाती रही, याद जो महज़ याद नहीं मेरी ज़िन्दगी है, रहरह कर मौत का पैगाम लाती रही...

1 comment:

  1. आंसुओं का रिश्ता होता है यादों के सफर से ... वो खत्म नहीं होतीं ...

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