Thursday, January 30, 2014

अफ़सोस



इस से पहले कि शेखर आरती से कुछ कह पाता, आरती उठकर वहां से चली गयी, सामने दूर तक सिर्फ अन्धेरा था, ये अन्धेरा कैसा कि जब की आज तो पूनम की रात थी, शायद ये अँधेरा आरती के मन का था, जो अब शेखर तक आ पंहुचा था, रात के कोई डेढ़ बज रहे थे, आरती भारी क़दमों से अपने घर की सीढ़िया चढ़ रही थी, घर जो कभी रौशन था शेखर की यादों से, उन चंद ख्वाबों से जो शेखर और आरती ने साथ देखे थे, पर अब यहाँ ‘बासी’ सच्चाई बस्ती थी, ‘सच जो बेहद कड़वा था, आरती के वो आखिरी शब्द शेखर के कानों में गूंजते रहे, ‘हमारा प्यार पवित्र था शेखर, पर तुम्हारे जाने के बाद उस शख्स का मुझे छूना, ऐसा लगता है जैसे मैं अपवित्र हो गयी हूँ, वो मेरा पति नहीं, उसने बस सिन्दूर लगाया था मुझे, उसने मुझे इस्तेमाल करने का सामान मात्र समझा, क्या शादी इसे कहते हैं बोलो? मैं शादी नहीं करना चाहती थी, तुम जानते थे, पर सिर्फ तुम्हारी खातिर की, कि तुम्हे ख़ुशी मिलेगी, पर ये क्या हुआ? इस शादी से न तुम खुश हो सके न मैं! उसने मेरे हर ख्वाब के चीथरे उड़ा दिए, उसने मुझे समझाया कि मैं साथ, ख़ुशी, मुस्कराहट इनमें से कुछ भी डीजर्व नहीं करती, यदि कुछ डीजर्व करती हूँ तो वो है, दर्द, आंसू, तकलीफ, तन्हाई, मैंने खुद को भुला दिया था, ये सोचना छोड़ दिया था, कि मैं कितनी तनहा हूँ, कि दर्द कितना है, कहाँ है? हर इलज़ाम वक़्त के सर मढ़ कर खुश होने की कोशिश कर रही थी, ‘ख़ुशी’ जिसका अर्थ अब मात्र चेहरे की मुस्कान है, जो तबतक बनी रहती है जबतक कोई सामने हो......

कभी सोचा है कैसा लगता होगा शाम ढले उस रस्ते पर चलना जिस रस्ते पर चलकर आप कभी अपने घर को जाया करते थे, अब लिए जाती है वही सड़क एक मकान की ओर, खाली बंजर सी शाम को उसी मकान में दाखिल होते, जहां अपनी ही खामोशी गूंजती हो चारों ओर....रात मुह खोले इंतज़ार कर रहा  हो कि कब आए वो और बाँध लूँ मैं उसकी साँसों को अपनी मुट्ठी में, कि कब दिख जाए उसकी वो ग़मगीन उदास आँखें और उड़ेल दूँ मैं उसकी यादें उसकी आँखों से, हर शाम ऐसी ही कटती है, पर फिर भी मैंने तुमको खुद से दूर रखा, तुम्हे अपनी हालत का अंदाजा न लगने दूँ यही कोशिश की, मैंने सोचा था, दोनों के दर्द में रहने से बेहतर है के तुम खुश रहो, खुश रहो इस सोच के साथ कि मैं खुश हूँ पर आज वो पर्दा भी जाता रहा.....आज सारे भरम टूट गए’

आरती की कही हर बात शेखर के कानों में गूंजती रही, वो मोड़ देना चाहता था हवा के रुख को, खींच लाना चाहता था गुज़रे हर वक़्त को, वो वक़्त जब आरती बात बात पर खिलखिला कर हंसती थी, बात बात पर मज़ाक करती थी, हर आने जाने वालों को जबतक जरा छेड़ न ले तबतक दम नहीं लेती थी, वो मिटा देना चाहता था उस शख्स की हर स्मृति को आरती के मन से जिसने आरती को कई टुकड़ों में तोड़ दिया था, शेखर अपनी आरती वापस चाहता था, वापस उसी रूप में, पर शायद अब ये मुमकिन न था..................

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