Friday, January 17, 2014

जो मिल के नहीं मिलते...वो याद बहुत याद आते हैं...



“जानते हो शेखर, तुम जबतक मेरे करीब थे मैं अक्सर सोचा करती थी, यदि तुम मुझे छोड़ दो तो मेरा क्या होगा, शायद वो पल वो घडी मेरे लिए सबसे मुश्किल घडी होगी, तुम जब टकटकी लगाए मुझे देखा करते थे, तो जानते हो मैं क्यूँ अपनी नज़रें फेर लेती थी, कि मेरे लिए बेहद मुश्किल होता था तुमसे दूर रह पाना, तुम्हारी आँखों की कशिश मुझे हर पल ये एहसास दिलाती थी कि आरती, तेरी जन्नत बस यहीं हैं और कहीं नहीं...सच..जब से मेरी ज़िन्दगी में तुम आये, मुझे पता ही न चला कि कब मैं तुम्हारी आदि हो गयी, खैर...अब मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता...” (आरती ने गहरी सास लेते हुए कहा) “तुम्हे गए एक अरसा हो गया और आज मिले भी हो तो अजनबी की तरह”, आरती अपनी बातें बोलते बोलते कभी शेखर की ओर देखती और कभी समंदर की ओर, शेखर एकटक आरती को तक रहा था, वो जनता था आरती को आज भी उस से फर्क पड़ता है, बेहद फर्क पड़ता है....

“सुनो आरती”....शेखर ने आरती की हथेली को अपने हाथ में थामते हुए कहा,
“हम्म...हाँ बोलो”, आरती ने आर्टिफीसियल मुस्कान के साथ के कहा,
“चलो दोनों भाग चलते हैं”, शेखर के चेहरे पर शरारती मुस्कान थी,
और आरती ठहाके मारकर हंस पड़ी, हँसते हँसते उसकी आँखों के कोरों से कब आंसू निकल पड़ें, उसे पता ही न चला,
“तुम्हे आज भी ये सब मज़ाक लगता है, है न?” आरती ने शेखर की आँखों में सवाल दागते हुए कहा, आरती की आँखों में दर्द था और होठों पर सवाल, वो सवाल जो जाने कितनी बार वो शेखर से पूछ चुकी थी, पर शेखर का कोई भी जवाब उसके दर्द को कम न कर पाता...

“और तुम्हे आज भी लगता है, कि तुमसे जुदा होने का फैसला मैंने ख़ुशी ख़ुशी लिया था? यकीन करो आरती, यदि एक परसेंट भी पॉसिबल होता तो मैं तुमसे एक पल को भी जुदा न होता, ये शादी मेरे लिए शादी नहीं बल्कि काला पानी की सजा है, मैं और आस्था, हमदोनो ही इस सजा को काट रहे हैं, आस्था की पसंद मैं कभी बन नहीं पाया, इन्फेक्ट शायद मैं बनना ही नहीं चाहता था, बस इतना समझ लो इस  शादी को चलाने के लिए जो हम दोनों की ज़िम्मेदारी बनती है इस रिश्ते के प्रति वही निभा रहे हैं, वो जानती है मेरे पास उसे देने के लिए प्यार नहीं, न प्यार जैसा कोई एहसास है, और मैं जनता हूँ, कि मैंने अपने हिस्से का प्यार कर चूका हूँ, तुमसे सिर्फ तुमसे, तुमने मुझे चाहा, और आज भी तुम्हारी आँखों में मैं अपनी तस्वीर पाता हूँ, मेरे लिए इतना ही काफी है....” शेखर ने दोनों बाजुओं में आरती को भर लिया था, आरती खामोश थी, शायद शेखर से कुछ और सुनना चाहती थी...शायद वो अपने सवाल के जवाब में कोई उम्मीद ढूंढ रही थी, जिसका दामन थाम वो आनेवाली ज़िन्दगी पिरो सके, पर इस बार भी उसके हाथ आई थी माज़ी के सायों में लिपटी बस चंद लकीरें....

सुबह होने को थी, पर सूरज दोनों को ही नज़र न आया, नज़र आया तो दूर वो दुधिया चाँद जो निराश हो डूब रहा था, शायद ठीक शेखर और आरती की तरह....... 


चंद सवाल, जो हम बार बार करते हैं...इस उम्मीद के साथ कि शायद इस बार कुछ अलग जवाब मिल जाए.....
 

1 comment:

  1. भीगे हुए पल ... छू गए दिल को ...

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