Friday, April 25, 2014

बस यूँ ही....

“ज़िन्दगी को समझने की कोशिशें ताउम्र हम करते रहे,
कभी ज़हरीला नाग और कभी सजा के नाम से पुकारते रहे,
जब मौत आई तो जाना ज़िन्दगी क्या है!”

ज़िन्दगी आसान है या मुश्किल. कैसे समझूँ मैं?
कैसे समझूँ कि अपनाया था जिन्हें अपने अपनों से बढ़कर,
बनाएं थे जो दिल के रिश्ते खून के रिश्तों से बढ़कर,
आज वही रिश्ते, मुझसे छूटें जाते हैं, 
दिल के बिखरे तारों के साथ आज ये बिखरे जाते हैं,
न सुकून है, न जुनू और न बची उम्मीद कोई,
फिर भी सब कहते हैं ‘कि समझो’ कहो कैसे समझूँ मैं??

No comments:

Post a Comment