Saturday, April 5, 2014

मेरी डायरी के पन्ने.........चंद ख्वाब

मेरा घर बहुत बड़ा था तब, मेरी उम्र बहुत छोटी थी जब, छोटे छोटे पैरों से आँगन में दौड़ती फिरती तब, जहां माँ सर पर आँचल लिए, साग चुना करती थी, उन दिनों मेरे घर में हमेशा हंसने की आवाजें आती, माँ, चाची, दादी, बुआ सब मिलकर आँगन में बैठे कभी अचार बनाती कभी पापड़ और कभी बड़े, मौसम जब गर्मियों का हो, तो अंगम रौशन रहता इनकी हंसी, और हम सब की चहकती आवाजों से, मेरे घर का एक भी शख्स ऐसा न था, जिसने मेरी माँ के हाथों के बुने स्वेटर न पहने हो, मुझे बाहर दोस्त बनाने की कभी ज़रुरत ही न पड़ी, छोटी चाची का बेटा मुझसे एक साल छोटा था, और काकी की दो बेटियाँ मुझसे एक और दो साल बड़ी, मेरे पास एक छोटी नन्ही गुडिया भी तो थी, जिसे माँ हॉस्पिटल से खरीद कर लायी थी, हाँ कई सालों तक तो मैं यही सोचती रही, फिर एक रोज़ बाबूजी ने बताया कि ये तुम्हारी छोटी बहन है, और इसके भी माँ बाबूजी हमदोनो ही हैं, बाबूजी की बात सुन पहली बार समझ में आया था के बड़ा होना किसे कहते हैं! उस रोज़ से गुडिया को नहलाने और तैयार करने की ज़िम्मेदारी मैंने उठा ली थी, उसके एक रोने से मुझे लगता कि क्या कर उसके चेहरे की हंसी वापस ले आऊं, उसका खिलखिलाता चेहरा मेरी ज़िन्दगी बन गया था, मुझे खुद की सुध न रहती एक उसकी हंसी के आगे मुझे कुछ न सूझता,  मुझे आज भी याद है माँ से चाची को कहते सूना था, ‘छोटी बहन के आने से तो अब बड़ी को अच्छा न लगता होगा? उसका प्यार जो बंट गया! तब माँ ने गर्व से कहा था, ना....मेरी अन्नू तो बस प्यार देना जानती है, पाने की तमन्ना इसने कभी की ही नहीं...” पर उस रोज़ मैं काफी देर तक यही सोचती रही, प्यार यदि सिर्फ दिया है मैंने, तो वो क्या था जिसे पाकर मैं इतनी खुश रहती हूँ....मुझसे ज्यादा देर इंतज़ार न हुआ. और जब बाबूजी आए तो मैंने झट से उनसे सवाल किया....मेरे सवाल सुन बाबूजी ने मुझे बहुत प्यार से अपनी गोद में बिठाया और जो कहा वो अब भी याद है मुझे “अन्नू, जो ख़ुशी देने में मिलती है वो पाने में कहाँ, तू इसीलिए खुश है, क्यूंकि तू देना सीख चुकी है, प्यार देना हमेशा और मेरी बिटिया बस तू ऐसी ही रहना.....”

2 comments:

  1. khubsurat jindgi ke haseen lamhen hain ye khawaab.......sundar abhiwayakti ....

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