Tuesday, May 13, 2014

तन्हाई - बेवजह

वो दिन भर खामोश रहती, कोई मुस्कुराता तो वो भी मुस्कुराती, कोई पूछता “कैसी हो” तो उसका जवाब हमेशा एक ही होता “अच्छी हूँ.....”,
पर शाम ढलते उसके चेहरे पर डर उभर आता, उसके कदम जैसे जैसे घर की ओर बढ़ते, वो डर बढ़ता जाता, घर पहुचकर मेज़ पर अपना पर्स रख, वहीँ चौखट पर बैठ जाती और घंटों कभी दीवार पर लटकी तसवीरें देखती, कभी सीलिंग से लटके पंखे को, कभी रसोईघर में जाती और जैसे ही बर्तन उठाती, उसे एक तेज़ चीख सुनाई देती, और उसके हाथ से बर्तन छूट जाता, वो अपने कान बंद कर लेती, वो आवाज़ और बढ़ जाती “छोड़ दो मुझे” मैं तुम्हे अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता, दम घुटता है मेरा इस घर में”
पर शेखर, हुआ क्या? क्या गलती हुई मुझसे? बोलो??
नफरत करता हूँ मैं तुमसे,
पर???
वजह बताना ज़रूरी नहीं समझता,
सुनो शेखर, हम सब फिर से शुरू करेंगे, तुम्हे मुझमें जो कुछ भी नापसंद है, मुझसे कहो, मैं छोड़ दूंगी, तुम जो चाहोगे वही करुँगी, प्लीज़ मुझे छोड़ कर मत जाओ......इन आवाजों का पीछा करते आरती दरवाज़े तक जाने कितनी ही बार गयी थी, पर कहीं कोई न था, न शेखर न उसके होने का आभास, ना उसके आने की उम्मीद, आरती के हाथ में थी तो बस गुज़रे लम्हों की बेहद बेचैन कर देनेवाली यादें......और बस एक सवाल.........................”क्यूँ?????”    

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