Monday, May 19, 2014

आदत...........

मैं जानती हूँ कि तुम आज भी मुझे भूले नहीं, तुम्हे है याद वो हर ‘पल’ जब हम साथ हुआ करते थे, वो हर जगह जहां हम साथ जाया करते थे, आज भी तुम्हारी एक ‘आह’ सी निकलती है मुझे देखकर कि तुम आज भी सोचते हो तुम इतने अधूरे न होते गर हम साथ होते....आज भी तुम्हारे चेहरे पर पल भर के लिए ही सही एक ख़ुशी की लहर सी दौड़ जाती है जब तुम्हारी आँखें मेरी आँखों से टकराती है, आज भी तुम्हारे दिल के उस ख़ास हिस्से पर दर्ज है नाम मेरा.....तुम कहा करते थे, ‘चाँद.....तुम मेरी ज़रुरत हो, मेरी चाहत ही नहीं, तुम मेरी आदत हो’ और जब मैंने तुम्हारे होठों पर अपनी उंगलियाँ रख दी थी, और पूछा था ‘क्या तुम मुझे भी छोड़ दोगे जिस तरह तुमने सिगरेट छोड़ दिया’ मेरे इस सवाल का जवाब मैं हमेशा ‘ना’ में सुनना चाहती थी, और तुम्हारे जवाब मेरी छलकती हुई आँखों को कब मुस्कुराती आँखों में तब्दील कर देते पता ही न चलता...’तुम्हारा जवाब हर दफे एक ही होता, ‘चाँद सिगरेट मेरी बुरी आदत थी, और तुम मेरी वो आदत हो, जिसका इंतज़ार मैंने ताउम्र किया है, तुम्हारा साथ तो बस तभी छूट सकता है जब ये सांस टूट जाए’ तुम्हारी बातें मेरी सीने में हर दफे कुछ सांस भर जाती, तुमपर यकीन मेरे होने को सार्थक करता.....


पर शेखर, वक़्त कितनी तेज़ी से बदल जाता है न, अब मैं तुम्हारी आदत न रही, ज़रुरत भी न रही बस एक अधूरी ख्वाहिश हूँ. अब ज़रूरत तुम्हारी कोई और है, अब आदत तुम्हारी कोई और है, मैं जानती हूँ मेरे जाने का तुम्हे अफ़सोस तो है पर मेरे बगैर जीने की तुमने आदत डाल ली है, कैसा इक्तेफाक है न, अब हम साथ नहीं, पर सांस मेरी भी चल रही है, और तुम्हारी भी.......

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