Wednesday, May 28, 2014

बचपन

वो दिन थे छुट्टियों के, जब हम उस तपती गर्मी में छत पर जाकर घरोंदे बनाया करते थे, दिन भर तपती गर्मी में रेत से सीपियाँ चुना करते, पकड़म पकड़ाई, विष अमृत, गिल्ली डंडे, पिट्टो, आँख मिचोली, पोषम पा, और कंचे खेला करते थे.... वो बचपन की नादान चालाकी भी अजब थी...गुड्डे गुड्डी के खेल में अक्सर गुड्डा मेरा होता, दीदी जो इतने नाजों से तैयार करती अपनी गुडिया को शादी के लिए, उसको मैं अपने गुड्डे से ब्याह कर अपने घरोंदे में रख लेती..और फिर अगली शादी में मेरा गुड्डा दीदी के घर में होता, इसबार गुडिया मेरी होती, और मैं शादी के बाद भी उसे विदा करने को तैयार न होती.........जितने ख़ास वो खेल होते, उतना ही ख़ास मेरा घर भी था, जहां पैसों की कमी तो थी, पर प्यार भरपूर था, माँ के सामने टेबल बजाकर खाना मांगना, कभी चमचे और थाली से साज़ की आवाज़ निकालना, और बाबूजी के आते ही, जोर जोर से रीडिंग डालना...अकेलापन किसी कहते हैं! ये तो शब्द भी सुना न था, बाबूजी डांटते तो माँ बचाती, माँ डांटती तो दीदी माँ से लड़ पड़ती... कितना सुखद था वो भोला सा बचपन, उनदिनों मोबाइल नहीं हुआ करते थे, इसीलिए मुलाकाते ज्यादा हुआ करती थी, टीवी भी हर घर में कहाँ थे, इसीलिए जिन दो चार घरों में टीवी हुआ करते थे उन्ही घरों में मोहल्ले के सारे लोग इकट्ठे होकर रामायण और महाभारत देखा करते थे, विक्रम बेताल की कहानियां और फिर फीचर फिल्म का इंतज़ार...और यदि इस बीच लाइट चली गयी तो दो पल का अफ़सोस फिर सब के ठहाकों की आवाजें, अँधेरे में कभी प्यास लग जाए तो माँ का पल्लू पकड़कर ही रूम तक जाना होता, क्या पता वो इमली के पेड़ वाला भूत खड़ा हो वहां,
अधखुली सी शाम में कुछ इशारे भी दिखा करते थे, वो भैया और वो दीदी जब भैया चश्में के अन्दर से दीदी को देखते और दीदी अपने दुपट्टे के कोर को पकड़ शर्माती, जब चाय की प्याली सबसे पहले उनके सामने लाने के बावजूद पहले सबको देकर फिर उनको देती, जब मुझसे कहती अपने भैया को जाकर ये रुमाल देना और कहना इसकी कढ़ाई मैंने खुद ही की है............मैं तपाक से कहती, तुम ही क्यूँ नहीं दे देती, भैया ही तो हैं...और वो डांट कर कहती ‘भैया वो तेरे हैं, मेरे नहीं!....’ मुझे कुछ भी समझ न आता....मैंने दीदी के आंसू निकलते हुए भी देखे थे उस रोज़ जब सब खुश थे, कि वो शादी में जा रहे हैं, और मैं खुश थी के मुझे नया लेहेंगा मिला है........ उनदिनों अमूमन लव मेरेज़ेज़ बहुत कम हुआ करते थे, और डाइवोर्स ना के बराबर....ज़िन्दगी आज़माने के लिए नहीं बल्कि जीने के लिए हुआ करती थी, चालीस की उम्र में माँ चालीस की ही नज़र आती थी, घर के काम माँ खुद ही किया करती थी, और बाबूजी का पेट तबतक न भरता जबतक वो माँ के हाथ का बना खाना न खाते....   
 
जूते के डिब्बे में रखा था कई बार अपनी गुडिया के उन कपड़ों को,
जो मुझको उतने ही प्यारे थे जितनी दीदी की वो नेट वाली पुरानी चुन्नी,
जिसे मैं अक्सर ओढ़ लिया करती थी अपनी हर ख़ूबसूरत फ्रॉक के साथ...
कई बार पहना था उसी चुन्नी को मैंने साड़ी की तरह,
और पूछा था माँ से ‘मैं कैसी लग रही हूँ,
माँ का जवाब हर बार एक सा होता, ‘दुल्हन लगती है मेरी बिटिया’,
और बाबूजी से कहती, ‘अब अपनी बिटिया के लिए दुल्हा ढूंढ ही लीजिये,
सारी  तैयारी तो इसने खुद ही कर ली, माँ की बात सुन मैं शर्मा जाती,
उम्र मात्र पांच साल थी तब....

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