Saturday, June 28, 2014

मैं और माज़ी

“इस जीवन का सबकुछ पीछे छुटता गया, और साथ रह गयी तो बस यादें...यादें कुछ तुमसे जुडी, कुछ सबसे जुडी, माँ, दीदी, बाबूजी सभी तो थे उन यादों में, जीते जागते, हँसते मुस्कुराते, पर मैं कहाँ थी? कहाँ थी मैं बोलो? जाने क्यूँ पर खुद को ही ढूंढ ही नहीं पायी... शेखर मेरे पास न आने वाला कल है, न गुज़रा हुआ कल...और अब तो ‘आज’ भी मेरा मेरे पास नहीं...सच....कितना अजीब है न...कभी कभी हम यादें संभालने में जीने का सलीका ही भूल जाते हैं, खुद को जाने कहाँ छोड़ आते हैं....इतना पीछे कि खुद को चाह कर भी ढूंढ नहीं पाते फिर!”

आरती खामोश थी, शेखर के मन में कई सवाल थे, पर पूछने की हिम्मत न जुटा सका...सवाल करता तो किस से करता आरती से? वक़्त से या नियति से? शेखर कार चलाता रहा और आरती... दूर डूबते सूरज के साथ कुछ और डूबती रही...

No comments:

Post a Comment