Monday, August 11, 2014

बस यूँही....


यूँही रुक रुक कर चलती रहीं सांसें अपनी,
यूँही थम थम कर वो नज़रें हमसे मिलाते रहे...

साथ साथ चलते रहे पर कब सहारे छूट गए,
रात तो चलती रही पर सारे तारे टूट गए,
जगमगाहट चाँदनी हर शाम बिखेरती तो थी,
देखते ही देखते क्यूँ काले बादल छा गए,

एक तनहा चाँद है अब, एक तनहा रात में,
एक तनहा मैं यहाँ हूँ दिल को थामे हाथ में,
डर तेरे जाने का था कल, आज कोई डर नहीं,
कल मेरा होता था सबकुछ, आज अपना कुछ नहीं

ये होंठ मुस्कुराते तो हैं, फिर भी खुशियों का इंतज़ार क्यूँ है इन्हें....

या मौला...ज़िन्दगी जीने की कुछ तो आसान शर्ते दे..............

कम साँसों के साथ ज़िन्दगी...आसन सी लगती है अब..................

हम दोनो का न मिलना ही अच्छा था, कि हमारे बीच कोई रिश्ता ज़िन्दा तो था।

नज़रें जाने क्यूँ पहरों चौखट पर टिकी रहती हैं,
न कोई ख्वाहिश, न कोई वादा और न हाथों में है अब लकीर कोई,
फिर भी ज़िन्दगी तुझ बिन इतनी अधूरी सी क्यूँ लगती है!

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