Tuesday, March 3, 2015

माज़ी के सफ़हे...

मुझे अंदाजा न था शेखर कि तुम्हारे जाने से मेरी ज़िन्दगी तार तार हो जाएगी, मुझमें जीने की उम्मीद न रहेगी, मरने का हौसला न रहेगा, हंसूंगी तो कुछ इस तरह कि जैसे एहसान किये जाती हूँ खुद पर, रोउंगी तो गले से आवाज़ न निकलेगी, सोचूंगी तो पहरों माजी में तफरीह करती रहूंगी, और लौटना चाहूँ भी तो लौट न सकुंगी, कि तुम सामने तो होगे, पर तुम मेरे ना होगे...सच कहूँ तो तुम्हारी चाँदनी में अब हौसला नहीं कि लड़ सके इस जहां से, लोगों की तंज निगाहों को सह सके, सुन सके गालियाँ, और फिर भी रखें उम्मीद को जिंदा कि एक दिन तुम मेरे होओगे, एक दिन हम साथ होंगे, याद है शेखर शादी के बाद जब मैंने तुमसे बेटे की मांग की थी, तो तुमने क्या कहा था? तुमने हँसते हुए कहा था कि “चाँद, ये शादी अभी दुनिया के सामने नहीं आयी, अभी से ये ख्यालों के महल बनाना शुरू न करो, तो मैंने कहा था, मैं तुम्हारे लिए इस दुनिया से लड़ सकती हूँ, कि मेरी दुनिया सिर्फ तुमसे है....तुमने हर बार की तरह सिर्फ मुस्कुरा भर दिया था, और छोड़ गए थे मेरे चेहरे पर अपनी दो आँखें, वो शरारती आँखें, जिनके आगे भी कुछ है, मैंने कभी सोचा ही नहीं..........

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