Monday, September 14, 2015

तन्हाई............फिर आएगा......

कितना भयानक रूप है इस ‘तन्हाई’ का, इसकी बांहें कितनी मजबूत हैं,
इसकी आँखें लाल हैं, दांत नुकीले,
ये जकड़े जाती हैं मुझे और..कुछ और ज़ोर से,
मैं डरती हूँ, भागती हूँ, दौड़ती हूँ, छिपती हूँ,
कभी बंद करती हूँ आंखें, कभी खोल देती हूँ,
रूकती हूँ, मुरती हूँ, अपनी हथेली से चेहरे को छिपाती हूँ,
सोचती हूँ, क्या ‘वो’ अब भी मेरे पीछे पड़ा होगा,
मैं भागती हूँ एक बार फिर बिना रुके,
बिना देखे इधर-उधर, दौड़ते-दौड़ते कुछ पल ठहर कर खुद को देखती हूँ,
और पाती हूँ खुद को, सुनसान रास्तों पर, बेनाम मंजिल पर,
मैं थक कर बैठ जाती हूँ, मेरा सारा शरीर टूट चूका है, अब मुझमे कुछ भी शेष नही,
उसकी दो आँखें अब भी मुझपर टिकी हैं, वो इसी मौके की तलाश में था,
उसके बांह मुझको अजगर की तरह बाँध लेती है,
मैं रोती हूँ, चीखती हूँ, हाथ पैर मारती हूँ, तड़पती हूँ,
मेरा देह ठंडा होता जाता है, सांस अब भी चलती रहती है,
फिर अचानक ही छोड़ देता है वो मुझे एक बार फिर,
चंद रोज़ के लिए, खुद के वजूद को समेटने के लिए,
छोड़ देता है मुझे, ये समझने के लिए कि वो फिर आएगा,
खुशियों से दूर, ग़मों के सागर में ले जाएगा,

तन्हाई............फिर आएगा......

8 comments:

  1. जिसके आँचल में बेहिसाब चांदनी हो
    जिसकी बातों में बदलते रुत की खुशबू हो
    जिसके आँखों में नीत नए स्वप्न हो
    उससे कोई तनहा करे भी तो करे कैसे ?

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  2. I like your poetry.
    All the best my dear nirupama.

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  3. Dear Nirupama, Dedicate for you.
    आज ये दीवार, पर्दों की तरह हिलने लगी,
    शर्त लेकिन थी की ये बुनियाद हिलनी चाहिए.

    हर सड़क पर, हर गली में, हर नदी, हर गांव में,
    हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए.

    सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नही,
    मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए.

    मेरे सीने में नही तो तेरे सीने में सही,
    हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए.

    From :- Shaan Saifi

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  4. छोटी-छोटी छितराई यादें
    बिछी हुई है लम्हों के लॉन पर
    नंगे पैर उन पर चलते चलते
    इतनी दूर आ गये
    कि अब भूल गये हैं --
    जूते कहाँ उतारे थे!

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