Thursday, July 13, 2017

सटीक अपनी जगह पर,

सबकुछ कितना अजीब है न! एक ज़माने में जिससे दोस्ती थी, फिर प्यार हुआ..फिर नफ़रत ....
वो सब बदल कर आज सीर्फ ‘जान पहचान’ रह गयी है....
ये जान पहचान का रिश्ता कितना अजीब होता है न, 
न उम्मीदें होती हैं, न दर्द ...
न कोई डर किसी को खोने का, न कोई ख़ुशी किसी को पाने की..
रिश्ता न कमज़ोर होता है, न मजबूत ही....
पर फिर भी कुछ रह जाता है..
वही रह गया हमारे बीच भी, तुम भी बदल गए, और हम भी...
अब मुझे चोट लगे तो तुहारे मुह से आह नहीं निकलती, 
और तुम्हे दर्द हो तो मेरी नींदें नहीं उडती.....
सब ठीक है अब...सटीक अपनी जगह पर,...

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