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मेरे शब्दों से तुम कोई रिश्ता न बुन लेना।

मेरे शब्दों से तुम कोई रिश्ता न बुन लेना। कि मेरे शब्द, शब्द मात्र हैं। इनमें छिपा कोई अर्थ नही, न प्रेम न  अलगाव, न पीड़ा, न सबलता न दुर्बलता, न छिपे हैं मेरे आंसू, न छिपी है कोई ज्वाला ही, ये शब्द, शब्द मात्र हैं। कि दरकार नहीं किसी की इन शब्दों को, शब्द मेरे कुछ ऐसे हैं, जिनमें बचे कोई एहसास नहीं। ये कविता नहीं, ये कोई कहानी नहीं। न किसी नारी की पीड़ा है, न प्रेम न वियोग। ये शब्द मात्र शब्द हैं, इनका होना मेरे होने का प्रमाण नहीं। इनका न होना मेरे जीवन का अंत नहीं। ये शब्द मात्र शब्द हैं, मेरे शब्दों से तुम कोई रिश्ता न बुन लेना। निरुपमा(24.4.20)

शायद प्यार

न सुकून अब कहीं, न चैन - ओ- क़रार कहीं, हुआ न हो इस दिल को किसी से कोई प्यार कहीं। गमों की साज़िश थी, मेरा लुटता गया क़रार कहीं, उन्हीं की पलकों तले नींद आए एक बार कहीं। मेरा ये होश अब और मेरे साथ क्या रहता, गया ये होश मेरा उनके साथ साथ कहीं। वो तेरे साथ हैं, अब हैं, या के वो हैं भी नहीं, सिसकती रात ने पूछा है बार बार यही। वो जो आएं तो इस बार जाने पाए ना, मेरे मैं ने मुझे कहा है बार बार यही। निरुपमा (23.4.20)

तुम्हे अब छोड़ देते हैं....

चलो कुछ रोज़ के लिए तुम्हे अब छोड़ देते हैं कुछ रोज़ तुम हमसे यूँही दूर दूर रहो , कुछ रोज़ नज़रों में बेगानापन रहे , कुछ रोज़ बेताल्लुकी में दिन कटें, कुछ रोज़ बेबसी में आंसू बहें , चलो कुछ रोज़ के लिए तुम्हे अब छोड़ देते हैं कुछ रोज़ दिन को दिन , रात को रात समझो , कुछ रोज़ हमें भूलने की कोशिश करो , कुछ रोज़ तुम जानो के हमारी ज़ात बेईमान थी , कुछ रोज़ के लिए तुमसे हर ताल्लुक तोड़ देते हैं , चलो कुछ रोज़ के लिए तुम्हे अब छोड़ देते हैं और करते हैं इंतज़ार कि कभी वो दिन भी आएगा , दर्द मुझे होगी , और दिल तेरा घबराएगा , देर शाम रात ढले , तू चैन कहाँ पाएगा , उस पल तक हर भरम हम तोड़ देते हैं , चलो कुछ रोज़ के लिए तुम्हे अब छोड़ देते हैं पर इतना याद रखना , के वक्त गुज़र न पाएगा , वक़्त बेवक्त हर शख्स तुझे मेरी ही याद दिलाएगा , है यकीं इस दफ़े तू फ़िर से लौट आएगा , फिलहाल के लिए ये सब यहीं कहीं छोड़ देते हैं , चलो हम कुछ रोज़ के लिए तुम्हे अब छोड़ देते हैं .....निरुपमा ( 25.2.20)

खत....

बस यूँही लिख लिखकर मिटा देने की आदत रही  अपनी , न जाने कितनी खतें आज भी इस सीने में दफ्न हैं. ...निरुपमा ( 19.2.20)

आज फ़िर ....

एक गहरी उदासी के कोख से जन्मी तेरी याद फ़िर से , आज फ़िर दर्द दिल में उभरने लगा है , आज फ़िर अपने साए से हम घबरा रहे हैं... निरुपमा ( 14.2.20)