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हैराँ

मैं खुद ही हैराँ हूँ अपने बदले हुए अंदाज़ से, मैं खुद ही परेशाँ हूँ अपने हर एक अंजाम से, जाने कैसे बदल गई ये शक्सियत मेरी, कोई मुझसे क्या कहे "आप तो ऐसे न थे" "प्यार इश्क मोहब्बत, हालत की पैदाइश है और हालात के आगे ही दम तोड़ देते हैं...." ......निरुपमा

'इश्क मेरा' तेरे दिल से मिट गया कैसे??

ज़िन्दगी को पर लग गए जैसे,  उड़ चली वो वक़्त के हर दहलीज़ को लांघते, मेरा बिखड़ा वजूद आज भी बिखड़ा पड़ा है,  वहीँ, ठीक वहीँ तेरी चौखट पर, तू आता है, मुझे देखता है,  पर सोचता नहीं,  एक तस्वीर हूँ शायद,  या शायाद कोई साया हूँ, तू आज भी मुझमें जिंदा है,  पर तुझमें मैं कहाँ हूँ!  वो जो एक रोज़ तूने आवाज़ मुझको लगाईं थी, उस आवाज़ की शिकन मेरे कानों में चुभने लगी है,  तू है मेरे ही आसपास कहीं आज भी, पर तुझे छूने की नाकाम कोशिशों से अब दिल,  ऊबने लगा है,  थकने लगा है,  टूटने लगा है, कि सोचती हूँ तुझको,  तो कभी खुद को भी सोच लेती हूँ,  तू कौन है मेरा, मैं कौन हूँ खुद की! दर्द तेरा जो मेरी आँखों में उभर आता था, इश्क मेरा...तेरे दिल से मिट गया कैसे??

चंद अशआर

चंद रिश्तों के नाम नहीं हुआ करते, उनके जुड़ने की पर चर्चा बहुत होती है.. मुझको मेरे घर का रस्ता बता ज़रा, मैं खुद को शायद कहीं तुझमें भूल आई हूँ..

तन्हाई

शाम के करीब पांच बजे थे, और मैं अबतक अपने बिस्तर पर लेटी पंखे को तक रही थी, न नाश्ता किया न कुछ खाना ही खाया, हाँ एक बार आहाट सी हुई थी तब दरवाज़े तक गयी थी फिर लौट आई थी, घर के एक कमरे में खुद को दिन भर बंद रखा मैंने, पर जाने क्यूँ.......... जाने क्यूँ एक अजब सी भीड़ ने मुझे घेरे रखा एक अजब से शोर से मेरा पीछा छुटता ही नहीं, तन्हाई अक्सर इंसान को फ्लैशबैक में ले जाती है, मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, तुमसे मिलना, शादी, माँ के चेहरे की मुस्कान, हमारा नया घर, और घर में एक एक सामान खरीदते वक़्त हज़ार हसरतें, हजारों आशाएं, अनगिनत ख्वाब......तुम्हारा जाना, मेरा इंतज़ार, हमारे बीच का तनाव और फिर सब का हस्तक्षेप, इन सब के बाद आज ये तन्हाई.....मैं जानती हूँ तुम कल वापस आ रहे हो, पर जाने क्यूँ, मुझे कुछ भी महसूस ही नही हो रहा, ऐसा लगता है कि अब क्यूँ आ रहे हो अब! क्यूँ आ रहे हो अब! अब तो फैसला भी हो गया था, मेरी किस्मत का, मेरी ज़िन्दगी का, हाँ कि मेरा कोई भविष्य नहीं है, मेरी ज़िन्दगी बस वर्तमान तक ही थी, अब कहानी ख़त्म होने को है, पर...तुम आ रहे हो! तुम क्यूँ आ रहे हो अब???? बस यही सोच रही हूँ, ...

मैं तब भी वहीँ खड़ी थी ठीक तुम्हारे पीछे

मैं तब भी वहीँ खड़ी थी ठीक तुम्हारे पीछे कि जब तुम उसका मुह तक रहे थे कि वो कुछ बोले ऐसा जिसको सुनकर मिल जाए तुम्हे सुकून, आ जाए तुम्हारे मन को चैन मिल जाए तुम्हारे दिल को  करार मैं तब भी वहीँ खड़ी थी ठीक तुम्हारे पीछे कि जब तुम उसका मुह तक रहे थे और उसने पलटकर तुमपर अपने शब्दों के बाण फेंके थे, तुम चित से पड़े थे कटु सत्य की ज़मीन पर, और वो हंसती हुई तुम्हारी लाचारी पर चल दी थी तुम्हे लांघते हुए, मैं तब भी वहीँ खड़ी थी ठीक तुम्हारे पीछे कि जब तुम्हारी उम्मीद बुझ रही थी, तुम्हारा प्यार नाउम्मीदी के तूफानों में घिरा था, तुम हताश से पड़े थे खुद में सिमटे, मैं खड़ी रही ताउम्र ठीक तुम्हारे पीछे कि कभी किसी मोड़ पर जो पैर तुम्हारे लड़खड़ाएं, तो थाम लूँ तुमको, टूटने न दूँ, रोक लूँ तुमको, खुद से रूठने न दूँ मुझे प्यार करना आया नहीं, पर मेरे आंसू तुम्हारी हर शिकस्त पर निकले, तुम्हारी मुस्कराहट मेरे जीने की वजह रही, तुम्हारे एक इशारे पर ये दुनिया छोड़ दूँ ऐसे जज्बों से मेरा दिल सराबोर रहा, मुझे प्यार करना तो आया नहीं, फिर भी मै...

ज़िन्दगी हर बार आखिरी सीढ़ी से फिसलती रही

" बुझे हुए दिल से एक आह सी निकली है....... यूँ लगता है जैसे देखते देखते हम लुट गए, और अफ़सोस करने का वक़्त भी न मिला, रोने लगे तो जैसे आंसू सूख गए, चीखना चाहे तो आवाज़ न निकली, चलना चाहे तो पाँव काट दिए किसी ने, मरना चाहे तो मौत भी न आई........." **** “ज़िन्दगी हर बार आखिरी सीढ़ी से फिसलती रही, तमाम उम्र मैं ज़िन्दगी का सिर्फ इंतज़ार करती रही” **** “ऐ दोस्त हाथों की लकीरें कभी मिटती नहीं, लाख चाहो...किस्मत बस यूँ ही बदलती नहीं, मेरे साथ जाने कैसे हर बार ये हादसा हुआ, बनती सी किस्मत की लकीरों को बारिश की बूंदों से मिटते देखा....”

माँ

बुजुर्गों को हँसते हुए देख बहुत अच्छा लगता है, कभी उनसे कोई छोटा सा सवाल करो, और उसका वो बहुत लंबा सा जवाब देते हैं, उस वक़्त उनके चेहरे को देखते हुए उनकी बातें सुनना कुछ अलग सा ही महसूस होता है, माँ कहती हैं ‘अब चलने में तकलीफ होती है, घुटने में दर्द रहता है, आँखों से दिखता भी कम है’ पर जब मुझे ऑफिस आने में देर हो रही होती है तो देखते देखते मेरे लिए टिफिन बना देती हैं, सीर्फ मेरी ख़ुशी के लिए वो चौथे महले तक चढ़ मेरे घर आ जाती है। बचपन में ही मेरी दादी नानी का साया मेरे सिर से उठ गया। इसलिए अनेकों कहानियां सुनाने का जिम्मा मां ने अपने सिर ले लिया। उनकी सुनाई हर कहानी आज भी ज़ुबानी याद है। जाने कितने जप, जाने कितनी पूजा, मां दिन रात आज भी जागकर करती है। जब भी उससे पूछा 'कुछ ला दूं तुम्हारे लिए मां' उसने अक्सर मेरे ही हाथ में कुछ पैसे थमा दिए और कहा 'तू अपने लिए कुछ नहीं करती, अपने लिए ले आ' । मां से जब भी पूछा, ‘माँ, बाबूजी से तुमको कोई शिकायत नहीं?’ तो वो कहती हैं, ‘तुम्हारे बाबूजी ने मुझे तुम जैसी प्यारी बेटियाँ दी, मुझे और क्या चाहिए था!’ कितनी अजीब बात है न, एक औरत...